काशी हिंदू विश्वविद्यालय के जन्तु विज्ञान विभाग में आज पेलियोजीनोमिक्स एवं पेलियोआर्कियोलॉजी संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। यह दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी डीएनए, पैलियोएंथ्रोपोलॉजी, गट माइक्रोबायोम और पॉपुलेशन जीनोमिक्स अनुसंधान जैसे विषयों को एक मंच पर लाने के लिए आयोजित की गई है। यह आयोजन भारत के प्राचीन मानव इतिहास को नए सिरे से समझने के लिए आयोजित किया गया है। इसमें कुल 63 वैज्ञानिक अपना शोध पत्र प्रस्तुत करेंगे। ASI के अपर महानिदेशक डॉ संजय ने कहा कि मानव जीवन के इतिहास पर जो काम बीएचयू करने जा रहा उसमें ASI भी मदद करेगा। जिससे इतिहास के पन्नों में छुपे रहस्यों से पर्दा उठेगा। जनजातीय समूहों पर ओडिशा में फैस रहे बिमारियों को रोकने पर हुआ रिसर्च भुवनेश्वर स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ लाइफ साइंसेज के निदेशक डॉ. देवाशीष दास ने आज जेनेटिक्स और लाइफ साइंस पर आयोजित एक महत्वपूर्ण सेमिनार में छात्रों को संबोधित किया। अपने वक्तव्य में उन्होंने संस्थान द्वारा संचालित एक प्रमुख फ्लैगशिप रिसर्च प्रोजेक्ट के बारे में विस्तार से जानकारी दी। डॉ. दास ने बताया कि यह प्रोजेक्ट विशेष रूप से ओडिशा के अत्यंत संवेदनशील जनजातीय समूहों (PVTG) पर केंद्रित है। भारत में कुल 75 ऐसे जनजातीय समूह हैं, जिनमें से 13 ओडिशा में पाए जाते हैं। इस शोध के तहत वैज्ञानिकों की टीम इन क्षेत्रों में जाकर जनजातीय समुदायों से सैंपल एकत्र करती है और उनके जेनेटिक प्रोफाइल तथा पोषण की स्थिति का अध्ययन करती है। उन्होंने बताया कि शोध के दौरान कुछ विशेष जेनेटिक म्यूटेशन और पॉलीमॉर्फिज्म की पहचान की गई है, जो इन समुदायों में कुछ बीमारियों के जोखिम को बढ़ाते हैं। इस आधार पर स्वास्थ्य सुधार के लिए जागरूकता फैलाना बेहद आवश्यक है। डॉ. दास ने कहा कि संबंधित मंत्रालयों जैसे आईसीएमआर और अन्य माध्यमों के जरिए इन समुदायों को शिक्षित किया जा सकता है। विशेष रूप से उन्होंने एंडोगैमस विवाह (एक ही समुदाय या परिवार में विवाह) के जोखिमों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यदि माता-पिता दोनों में किसी बीमारी से जुड़े जीन मौजूद हैं, तो उसके बच्चों में स्थानांतरित होने की संभावना काफी बढ़ जाती है। उन्होंने सुझाव दिया कि जागरूकता के माध्यम से लोगों को ऐसे विवाह संबंधों में सावधानी बरतने के लिए प्रेरित किया जा सकता है, जिससे आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाया जा सके। पिछले 10,000 वर्षों में भारत में बड़े पैमाने पर कोई मानव प्रवास या बाहरी आगमन नहीं हुआ: प्रो वलिम्बे प्रो. एस.आर. वालिम्बे ने अपने व्याख्यान में एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष प्रस्तुत किया, जो भारत की प्राचीन जनसंख्या इतिहास को नई दृष्टि देता है। उनके अनुसार, पिछले 10,000 वर्षों (यानी होलोसीन काल से अब तक) में भारत में बड़े पैमाने पर कोई मानव प्रवास या बाहरी आगमन नहीं हुआ। न तो कोई बड़े आक्रमण हुए, न ही लाखों-करोड़ों लोगों का सामूहिक स्थानांतरण। इसके बजाय, केवल व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान या सीमित व्यक्तिगत/समूह स्तर के छोटे-मोटे प्रवास ही दर्ज किए गए हैं। मानवशास्त्रीय प्रमाण: प्राचीन कंकालों के अध्ययन से देखा गया है कि उत्तर-पश्चिम भारत से लेकर दक्षिण तक, हड़प्पा काल (लगभग 4500-1900 ईसा पूर्व) से लेकर बाद के कालों में शारीरिक विशेषताओं में क्रमिक निरंतरता बनी रही। लंबे सिर से चौड़े सिर की ओर धीरे-धीरे होने वाला बदलाव स्थानीय अनुकूलन और विकास का परिणाम है, न कि किसी बड़े बाहरी समूह के आगमन का। मानव मे कुछ संक्रामक रोगों और पोषण-संबंधी बीमारियों के निशान मिलते हैं, जो कृषि क्रांति और घनी बसावट के साथ जुड़े हैं, लेकिन ये भी स्थानीय स्तर पर हुए परिवर्तनों को दर्शाते हैं।

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