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भिवाड़ी ब्लास्ट: मजबूरी में गए, राख बनकर लौटे:पहचान के लिए दो-दो बार करना पड़ा DNA ; परिजन बोले-बिहार में रोजगार तो आग में न जलते

‘घटना के वक्त फैक्ट्री में 9 मजदूर काम कर रहे थे। ब्लास्ट में 8 मर गए, मैं अकेला बचा। मैं मिसाइल सेक्शन में काम कर रहा था। तभी जोरदार धमाका हुआ। कान सुन्न हो गए। धुआं ऐसा कि कुछ दिख नहीं रहा था। आग चारों तरफ फैल रही थी। शीशा तोड़कर कमरे के बाहर छलांग लगाई। उस वक्त लगा, ये मेरी आखिरी सांस है।’ ये कहना है घायल मजदूर नितेश कुमार का, जिनकी आवाज घटना के बारे में बताते हुए अभी भी कांप रही थी। दरअसल, राजस्थान के भिवाड़ी स्थित पटाखा फैक्ट्री में 16 फरवरी को भीषण विस्फोट हुआ। इसमें बिहार के मोतिहारी जिले के 8 मजदूरों की मौत हो गई। इसमें से 7 मजदूरों का शव रविवार को गांव पहुंचा। इन सभी का अंतिम संस्कार कर दिया गया है। वहीं, आंठवे मजदूर का शव आज मोतिहारी पहुंचेगा। घटना की आपबीती को जानने के लिए भास्कर की टीम ने मृतकों के परिजनों से बात की। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… घटना से जुड़ी कुछ तस्वीरें देखिए… ‘मैं मौत के मुंह से निकलकर आया हूं’ आंखों देखा हाल बताते हुए घायल नितेश कुमार की आवाज कांपने लगती है। वे कहते हैं, ‘16 फरवरी की सुबह करीब 9 बज रहे थे। मैं रोज की तरह अपने काम में जुटा था। उस समय फैक्ट्री में हम 9 लोग काम कर रहे थे। इनमें से 8 की मौत हो गई। मौत के मुंह से सिर्फ मैं ही बचकर निकल पाया हूं।’ नितेश आगे बताते हैं, ‘मैं मिसाइल बनाने वाले सेक्शन में था। कुछ मजदूर मशीन में बारूद डाल रहे थे। तभी अचानक जोरदार ब्लास्ट हुआ। धमाके की आवाज इतनी भयानक थी कि कुछ सेकेंड के लिए मेरे कान सुन्न हो गए।’ ‘धुआं ऐसा कि कुछ दिख नहीं रहा था’ वह आगे कहते हैं, ‘ब्लास्ट होते ही आग फैलने लगी। जान बचाने के लिए मैंने तुरंत भागने की कोशिश की। तेज धुएं की वजह से मुझे कुछ नजर नहीं आ रहा था। सब धुंधला-धुंधला दिख रहा था। फिर भी हिम्मत नहीं हारी। हाथ-पैर टूटने का डर था, लेकिन मैंने एक कमरे का शीशा तोड़ दिया और किसी तरह दूसरे कमरे में पहुंचा। शीशा तोड़ते समय मेरा सिर फट गया। खून बहने लगे, अगर मैं सेकेंड भर भी रुकता, तो जिंदा नहीं बच पाता।’ दो लोग जलते हुए भागे, लेकिन बच नहीं पाए नितेश ने आगे बताया, ‘जब मैं बाहर निकला तो देखा कि दो लोग आग में जलते हुए बाहर भाग रहे थे। लेकिन उनका पूरा शरीर राख हो चुका था। वे मौके पर ही गिर पड़ें। उन्हें बचाने का कोई तरीका ही नहीं था। ब्लास्ट के बाद करीब आधे घंटे तक मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। आंखें जल रही थीं। हवा में धुआं ही धुआं था। बस इतना याद है कि किसी तरह मैं रेंगते हुए बाहर आया और लोग मुझे उठाकर अस्पताल ले गए।’ पहली बार गलत आया था DNA रिपोर्ट ‘राजस्थान के भिवाड़ी में हुए भीषण पटाखा फैक्ट्री ब्लास्ट में पहली बार में DNA रिपोर्ट गलत आया था। परिजन के मुताबिक, शव की हालत इतनी भयावह थी कि पहचान तक संभव नहीं थी। प्रशासन को दो बार DNA टेस्ट कराना पड़ा था। इस वजह से 7 दिन बाद गांव में शवों का अंतिम संस्कार हो पाया है।’ बिहार सरकार गरीबों को देखती, तो हमारा बच्चा जिंदा होता सूजान की बुआ सुगांधी फफक-फफक कर रोते हुए बताती हैं, ‘अगर बिहार में रोजगार होता, अगर सरकार गरीबों को देखने वाली होती, तो ये नौबत नहीं आती। सरकार पर भड़ास निकालते हुए सुगांधी कहती हैं, हमारी सुनने वाला कोई नहीं है। अगर संभव हो सके तो मुझे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सीएम नीतीश कुमार और चिराग पासवान से मिलवाइए। मैं अपने भतीजे की मौत का दर्द उनके सामने रखूंगी। उनसे कहूंगी कि हमारे परिवार को मदद दी जाए। हम गरीब लोग हैं, हमारा सहारा ही छिन गया। अगर बिहार में नौकरी रहती, तो हमारे घर के बच्चे दूसरे प्रदेश में मजदूरी करने नहीं जाते। इस हादसे के पीछे केवल फैक्ट्री का ब्लास्ट नहीं, बल्कि मजबूरियां भी जिम्मेदार है।’ सुगांधी ने घटना वाले दिन की बातें बताते हुए कहा, ‘सूजान सुबह नाश्ता कर घर से गया ही था कि बोला बुआ, दोपहर एक बजे खाना पहुंचा देना। फैक्ट्री में ही खा लूंगा। लेकिन कुछ ही घंटों बाद उनका संसार उजड़ गया।’ प्रशासन ने अस्पताल से फैक्ट्री तक दौड़ाया सुगांधी बताती हैं, ‘करीब 9.30 बजे कुछ लोग दौड़ते हुए मेरे घर पर आए। उन्होंने बोला, आपके भतीजे की मौत हो गई है। फैक्ट्री में ब्लास्ट हुआ है। सभी मृतक और घायल पिक्चर अस्पताल ले जाए जा रहे हैं। आप भी वहीं चलिए। यह खबर सुनते ही मैं गैस पर रखा खाना छोड़कर दौड़ पड़ीं। जब मैं अस्पताल पहुंची तो वहां के लोगों ने कहा कि अभी कोई शव नहीं आया है, आप लोग यहां से जाइए। जब शव आएगा तब बताएंगे। यह सुनकर मैं फैक्ट्री की ओर दौड़ पड़ी, लेकिन फैक्ट्री के पास पहुंचते ही मुझे आधे किलोमीटर पहले ही रोक दिया गया। मैं रो-रोकर कह रही थी कि मेरा भतीजा सूजान अंदर है… मुझे जाने दीजिए, लेकिन किसी ने नहीं सुना। मुझे अपने भतीजे की एक झलक तक नहीं देखने दी।’ लाशें राख जैसी हो चुकी थीं, पहचानना मुश्किल था करीब दो घंटे बाद प्रशासन ने सभी शव परिजनों को दिखाए।’ सुगांधी कहती हैं, ‘जब लाशें दिखाई गईं, हम पहचान नहीं पा रहे थे। सब राख में बदल चुका था। किसी की शक्ल नहीं थी, किसी का शरीर नहीं था। दिल दहला देने वाला मंजर था। हमलोग सरकार से मुआवजा, स्थायी नौकरी और दोषी फैक्ट्री मालिकों पर कड़ी कार्रवाई की मांग करते हैं।’ सुगांधी कहती हैं, ‘ये सिर्फ हादसा नहीं, हमारी गरीबी की मार है। हमारे घर के लड़के जिंदा रहने के लिए बाहर जाते हैं, और लौटते हैं तो राख बन जाते हैं। आखिर कब तक ऐसा होता रहेगा।’ हमारे पास रहने को घर तक नहीं मिंटू की मां रेखा रो-रोकर कहती हैं, ‘हमारे पास रहने के लिए पक्का घर तक नहीं है। पुआल के टूटे-फूटे छप्पर के नीचे पूरा परिवार रहता है। मिंटू ही एक कमाने वाला था। उसी की आमदनी से हमारा चूल्हा जलता था। अब वह भी नहीं रहा… हम किसके सहारे जिएंगे?’ ‘मेरी एक जवान बेटी है, उसकी शादी कौन करेगा? मेरे पति लकवाग्रस्त हैं, कुछ कर नहीं पाते। कर्ज लेकर हमने मिंटू को बाहर कमाने भेजा था, लेकिन अब वह कर्ज कैसे चुकाएंगे…ये हमें भी नहीं पता। हम राजस्थान और बिहार सरकार से मदद चाहते हैं।’ आपका दामाद तड़प-तड़प कर जल गया मिंटू की सास कंचन देवी की आंखें सूज चुकी हैं। वह कहती हैं, ‘फैक्ट्री में काम करने वालों ने मुझे बताया, आपका दामाद तड़प-तड़पकर जल गया, लेकिन उसे कोई बचा नहीं पाया। जब मेरी बेटी को खबर मिली तो वह खुद जान दे देती, हमने बड़ी मुश्किल से उसे रोका है। अगर बिहार में काम रहता, अगर सरकार गरीब को सहारा देती, तो हम अपने बच्चे प्रदेश क्यों भेजते? हम गरीब पेट के लिए आग से खेलते हैं… मजबूरी है हमारी, नहीं तो कौन अपना घर-दुआर छोड़ना चाहता है?’ लास्ट बार पति का चेहरा तक नहीं पहचान पाई मिंटू की पत्नी का दर्द दिल दहला देने वाला है। वह बताती हैं, ‘मैं भिवाड़ी में ही काम करती थी। वहीं मिंटू से मुलाकात हुई और परिवार की रजामंदी से हम दोनों ने शादी कर ली। शादी के बाद मिंटू घर चलाने के लिए पटाखा फैक्ट्री में काम करने लगा।’ ‘15 फरवरी की रात मैं देर से सोई थी। इसी वजह से 16 फरवरी को उठने में लेट हो गया। सुबह 9 बजे जब सोकर उठी तो पता चला कि मिंटू काम पर चला गया है। आधे घंटे बाद ही वहां पर काम करने वाले मिंटू के दोस्त का फोन आया- आपका पति नहीं रहा।’ ‘घटना की जानकारी मिलने के बाद जब मैं फैक्ट्री पहुंची, तो हर तरफ राख ही राख थी। मैं पहचान ही नहीं पा रही थी कि मेरे पति का कौन-सा शव है। सब जलकर काला ढेर बन चुका था। अगले दिन DNA से पहचान हुई, उस पल मैं टूट गई। अब मैं किसके सहारे जिऊंगी?’ 6 दिन दर्द से लड़ने के बाद अनूप ने भी तोड़ा दम इसी फैक्ट्री ब्लास्ट में घायल हुए अनूप की मां गीता देवी का दर्द भी कम नहीं है। वह रोते हुए कहती हैं, ‘मेरा बेटा 16 फरवरी को जल गया था। 6 दिन से इलाज चल रहा था, लेकिन 22 फरवरी को उसने दम तोड़ दिया। अब उसकी बहन की शादी हम अकेले कैसे करवाएंगे। पूरे घर का ध्यान कौन रखेगा।’ ‘घटना से एक दिन पहले मेरी उससे बात हुई थी। बेटे का फोन कंपनी वाले जमा कर लेते थे, इसलिए बात कम होती थी। उसकी मौत की खबर सुनकर उसकी बहन बार-बार बेहोश हो रही है।’


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