लखनऊ के निरालानगर स्थित अनुराग पुस्तकालय में भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत की पूर्व संध्या पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम नौजवान भारत सभा और स्त्री मुक्ति लीग ने ‘भगतसिंह का पैगाम और नौजवानों की जिम्मेदारी’ विषय पर आयोजित किया, जिसमें बड़ी संख्या में युवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। गोष्ठी में वक्ताओं ने शहीदों के विचारों को याद करते हुए वर्तमान समय में उनकी प्रासंगिकता पर चर्चा की। नौजवान भारत सभा के लालचंद्र ने बताया कि 23 मार्च 1931 को अंग्रेजी हुकूमत ने भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी थी। उन्होंने कहा कि शहीदों ने यह बलिदान इस विश्वास के साथ दिया था कि उनकी कुर्बानी लाखों युवाओं को आजादी की राह पर चलने के लिए प्रेरित करेगी। अंग्रेजों ने भारत छोड़ा लालचंद्र ने आगे कहा कि देश के लोगों ने उस विश्वास को सच साबित किया और केवल 16 साल बाद अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा। हालांकि, आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या उन शहीदों का सपना पूरा हो पाया है। 1947 के बाद आजादी के इतने वर्षों में आम जनता को क्या मिला, इस पर विचार करने की आवश्यकता है। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि विकास की चमक-दमक केवल कुछ गिने-चुने लोगों तक सीमित है, जबकि आम जनता आज भी संघर्ष कर रही है। देश के संसाधनों और मेहनतकशों की कमाई से बड़े पूंजीपतियों की तिजोरियां भर रही हैं, वहीं आम लोगों के हिस्से में मुश्किलें और परेशानियां ही आ रही हैं। मौजूदा व्यवस्था ने समाज में हिंसा को बढ़ावा दिया परिचर्चा के दौरान यह भी कहा गया कि मौजूदा व्यवस्था ने समाज में आपसी फूट, नफरत और हिंसा को बढ़ावा दिया है। भ्रष्टाचार और अपराध में तेजी आई है, और सत्ताधारियों के वादे हकीकत में पूरे नहीं हो पाए हैं। ऐसे में युवाओं की जिम्मेदारी है कि वे भगतसिंह के विचारों को समझें और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए आगे आएं।कार्यक्रम का समापन शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित कर किया गया।

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