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बोधगया में पहली बार अंतरराष्ट्रीय त्रिपिटक पाठ समारोह:27 देशों के 20 हजार श्रद्धालु जुटेंगे, अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री उद्घाटन करेंगे

बोधगया में 2 से 12 दिसंबर तक 20वें अंतरराष्ट्रीय त्रिपिटक पाठ समारोह का आयोजन किया जा रहा है। विश्व की बौद्ध आध्यात्मिक राजधानी माने जाने वाले बोधगया में भारत पहली बार इस ऐतिहासिक आयोजन की मेजबानी कर रहा है। यह समारोह महाबोधि मंदिर परिसर स्थित पवित्र बोधिवृक्ष के नीचे आयोजित होगा, जिसमें 27 देशों से 20,000 से अधिक बौद्ध भिक्षु और श्रद्धालु शामिल होंगे। आयोजकों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी समारोह में शामिल होने के लिए औपचारिक निमंत्रण भेजा है। समारोह का उद्घाटन 2 दिसंबर को अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू और उपमुख्यमंत्री चौना मीन करेंगे। केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले 8 दिसंबर को विशेष पूजा में शामिल होंगे, जबकि केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी 12 दिसंबर को समापन समारोह में उपस्थित रहेंगे। महाबोधि इंटरनेशनल त्रिपिटक के फाउंडर प्रेसिडेंट संगा सेना और कोषाध्यक्ष भिखूनी शाक्य अहमद हिना ने बताया कि यह समारोह अब तक का सबसे व्यापक और ऐतिहासिक आयोजन होगा। 20,000 से अधिक बौद्ध भिक्षु होंगे शामिल इस वैश्विक धार्मिक आयोजन में थाईलैंड, म्यांमार, श्रीलंका, कंबोडिया, लाओस, वियतनाम, नेपाल, इंडोनेशिया, बांग्लादेश और अमेरिका सहित 27 देशों से 20,000 से अधिक बौद्ध भिक्षु और श्रद्धालु भाग लेंगे। ये सभी 12 दिनों तक पवित्र बोधिवृक्ष के नीचे त्रिपिटक—बौद्ध धर्म के मूल सिद्धांतों का संग्रह—का संयुक्त पाठ करेंगे। इस सामूहिक पाठ का मुख्य उद्देश्य विश्व शांति, करुणा और सद्भाव का संदेश फैलाना है। बड़ी संख्या में अंतरराष्ट्रीय आगंतुकों की उपस्थिति को देखते हुए, प्रशासन ने सुरक्षा, यातायात, आवाजाही, आवास और भोजन के लिए व्यापक प्रबंध किए हैं। शहर के होटल, धर्मशालाएं और अन्य आश्रय स्थल पहले से ही पूरी तरह बुक हो चुके हैं। महाबोधि मंदिर परिसर और कालचक्र मैदान में तैयारियां अंतिम चरण में हैं, और मंदिर परिसर को विशेष रूप से सजाया गया है। यहां दैनिक अनुष्ठान, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और धार्मिक विमर्श भी आयोजित किए जाएंगे। बोधगया फिर बना वैश्विक आध्यात्मिक केंद्र जहां भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया था, वही बोधगया एक बार फिर वैश्विक केंद्र में है। यह समारोह न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत की आध्यात्मिक विरासत को विश्व मंच पर और अधिक प्रतिष्ठा दिलाने वाला यह आयोजन बौद्ध समुदाय के लिए यादगार अवसर बन गया है।


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