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बीएनएमयू में आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार का समापन हुआ:मिट्टी में पोषक तत्वों और नमी को लंबे समय तक बनाए रखने में बायोचार कारगर : अभिजीत घोष

श्रीनगर(मधेपुरा) | मंगरवारा पंचायत स्थित कबीर नगर अगाढ़ टोला में 28 फरवरी से त्रिदिवसीय संगीतमय कबीर सत्संग स‌ज्ञान यज्ञ का भव्य आयोजन किया जाएगा। कार्यक्रम को लेकर क्षेत्र में आध्यात्मिक उत्साह का माहौल है तथा तैयारियां जोरों पर चल रही हैं। आयोजकों ने बताया कि तीन दिनों तक चलने वाले इस सत्संग यज्ञ में प्रतिदिन प्रातः 6:30 बजे से 11 बजे तक तथा दोपहर दो बजे से छह बजे तक प्रवचन एवं सत्संग का कार्यक्रम आयोजित होगा। वहीं संध्या सात बजे से नौ बजे तक संगीतमय भजन एवं आध्यात्मिक संगीत की प्रस्तुति दी जाएगी। कार्यक्रम में जोधपुर राजस्थान से पुज्यसंत ईश्वर साहब के साथ साथ भागलपुर से संत अभय साहब,जीवन ज्योति केंद्र पुर्णिया से संत महिन्द्र नारायण साहब और कबीर आश्रम बेलसारा से संत रामस्वरूप साहब का सानिध्य प्राप्त होगा। इनके अतिरिक्त क्षेत्रीय संत-गुरुजन एवं साधक भजनोपदेशकों की भी गरिमामयी उपस्थिति रहेगी। आयोजक भूपेन्द्र मंडल,बिप्लव कुमार,फागु प्रसाद मंडल,दामोदर मंडल,सुरेश मंडल, रामबिलास, राजेन्द्र यादव, मु.हकीम, जयकृष्ण यादव आदि थे। भास्कर न्यूज | मधेपुरा बीएन मंडल विश्वविद्यालय रसायन शास्त्र विभाग की ओर से आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनार रिसेंट ट्रेंड्स इन केमिकल साइंसेज एंड रीसेंट ट्रेंड्स इन केमिकल साइंसेज एंड इंटरडिसिप्लिनरी रिसर्च के अंतर्गत दूसरे दिन के तीसरे तकनीकी सत्र में इंडियन केमिकल सोसायटी के सचिव अभिजीत घोष ने बायोचार का निर्माण और उपयोगिता विषय पर विस्तृत एवं ज्ञानवर्धक व्याख्यान प्रस्तुत किया। इस सत्र का चेयरपर्सन प्रो. नरेश कुमार और रिपोटियर डॉ. अरूनव सेनगुप्ता ने किया। डॉ. घोष ने बायोचार की अवधारणा को सरल एवं वैज्ञानिक ढ़ंग से स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि बायोचार एक कार्बन-समृद्ध ठोस पदार्थ है, जिसे जैविक अपशिष्ट या बायोमास को सीमित ऑक्सीजन की उपस्थिति में उच्च तापमान पर तापीय अपघटन प्रक्रिया द्वारा तैयार किया जाता है। खेतों की उर्वरता बढ़ाने में बायोचार पूरी तरह से सहायक कहा कि यह तकनीक न केवल कृषि अपशिष्टों के वैज्ञानिक उपयोग का मार्ग प्रशस्त करती है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और कार्बन अवशोषण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। डॉ. घोष ने बायोचार की तैयारी की विभिन्न विधियों पर विस्तार से प्रकाश डाला।उन्होंने बताया कि धीमी पायरोलिसिस विधि से अधिक मात्रा में बायोचार प्राप्त किया जा सकता है, जबकि तीव्र पायरोलिसिस में बायो-ऑयल का उत्पादन अधिक होता है। उन्हों ने गैसीफिकेशन और हाइड्रोथर्मल कार्बोनाइजेशन जैसी आधुनिक तकनीकों का भी उल्लेख किया। उन्होंने समझाया कि तापमान, बायोमास का प्रकार, ताप की दर और निवास समय जैसे कारक बायोचार की संरचना, सतह क्षेत्रफल, छिद्रता और रासायनिक गुणों को प्रभावित करते हैं। अपने संबोधन में उन्होंने विशेष रूप से कृषि अवशेषों जैसे धान की भूसी, गन्ने की खोई, लकड़ी के अवशेष और पशु अपशिष्ट से बायोचार तैयार करने की संभावनाओं पर बल दिया।


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