‘बांग्लादेश में हिंदुओं का घर लूट रहे, कई घरों को जलाया गया और बहन-बेटियों की खुलेआम इज्जत लूटी जा रही है। हम सभी को भाई मानते हैं, लेकिन वह हमारे साथ ऐसा कर रहे। जिस तरह हिंदुओं को चुन-चुन कर मार रहे, वैसे ही सरकार उन मुसलमानों को भी चुन-चुन कर मारे।’ यह गुस्सा है किशनगंज के नेपालगढ़ कॉलोनी में रहने वाली जयंति सुत्रधार का। इसी कॉलोनी के रहने वाले प्रिय रंजन कहते हैं कि मेरे परिवार के लोग बांग्लादेश में जिंदा हैं या मार दिए गए, कोई अता-पता नहीं है। 7 दिन पहले बात हुई थी। वे लोग डरे हुए थे। फोन पर बताया था कि हिंदुओं को जबरदस्ती टोपी पहना रहे। मर्दों को लुंगी पहना रहे हैं और महिलाओं को बुर्का। विरोध करने पर जान से मार रहे हैं। बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के तख्तापलट के बाद बीते डेढ़ साल से हालात खराब हैं। वहां अल्पसंख्यक हिंदुओं को निशाना बनाया जा रहा है। उन्हें जिंदा जलाया जा रहा है। जिसके चलते किशनगंज में रहने वाले बांग्लादेशी हिंदुओं के परिजन बेहद परेशान हैं। किशनगंज के हिंदू परिवारों के परिजन बांग्लादेश में किन हालातों में रह रहे हैं? उनकी क्या रिश्तेदारों से बातचीत हो पा रही है? अपने बांग्लादेशी परिजनों को लेकर वे क्या कहते हैं? यह जानने के लिए हम नेपालगढ़ कॉलोनी पहुंचे और उन लोगों से बात की। पढ़िए भास्कर की पूरी रिपोर्ट…। बांग्लादेश में रहने वाले परिजनों को लेकर चिंतित हैं लोग बांग्लादेश के सैकड़ों हिंदू परिवार बिहार में रहते हैं, जो शरणार्थी बन कर भारत आए थे। तब इंदिरा गांधी ने करीब 67 बांग्लादेशी हिंदू परिवारों को किशनगंज के नेपालगढ़ कॉलोनी में बसाया था। आज ये सभी हिंदू परिवार भारत के नागरिक हो गए हैं, लेकिन इनके परिजन आज भी बांग्लादेश में रहते हैं। वहां हालात बेकाबू होने के बाद से इन लोगों की बांग्लादेश में रहने वाले रिश्तेदारों से बात नहीं हो पा रही है। यहां हमारी पहली मुलाकात जयंति सुत्रधार से हुई। जयंति सुत्रधार ने बांग्लादेश सरकार के खिलाफ गुस्सा जाहिर करते हुए कहा कि, ‘हम नहीं चाहते कि हमने जो आज से 50 साल पहले बांग्लादेश में सहा था, अब फिर से वही यातना कोई हिंदू दोबारा सहे। बांग्लादेश के हिंदुओं को भारत में शरण देने की मांग जयंति सुत्रधार आगे कहती हैं कि, ‘हम हिंदू किसी मुसलमानों के साथ तो ऐसा नहीं करते हैं। टोपी वालों को हम भाई मानते हैं, लेकिन वह हमारे साथ ऐसा क्यों कर रहे हैं? हम भारत के प्रधानमंत्री से विनती करते हैं कि पूरे बांग्लादेश को अपने देश में मिला ले। जितने हिन्दू हैं, उनको भारत में शरण मिले। उनके लिए अपने देश के दरवाजे खोले जाएं।’ जयंति बताती हैं कि, ‘एक दिन पहले ही हमारी बात हुई है। उन लोगों ने बताया कि एक गांव से 18 हिंदुओं को गायब कर दिया गया है। जहां हमारे परिजन रहते हैं, वहां एक नदी है। उसी नदी को पार कर लोग दूसरी ओर काम करने जाते हैं। वह सभी नाव से जा रहे थे, लेकिन अब वे कहां गए, किसी को नहीं पता है।’ हमारे परिजनों को शक है कि उनकी हत्या कर नदी में ही फेंक दी गई है। वहां छोटी-छोटी बच्चियां हैं, कब किसके साथ क्या हो जाए, हमेशा मन में डर बना रहता है। यहां से महज 100 किमी की दूरी पर वो लोग हैं, लेकिन स्थिति ऐसी है कि हम उनसे मिल भी नहीं सकते हैं। सात दिन पहले बात हुई, अब संपर्क नहीं हो पा रहा- प्रिय रंजन शर्मा इसी मुहल्ले में रहने वाले प्रिय रंजन शर्मा से हमारी मुलाकात हुई। इनका परिवार बांग्लादेश के रंगपुर में रहता है। इनके दादाजी भारत आ गए थे। जब से बांग्लादेश में हालत बिगड़े हैं, तब से लगातार मैं अपने परिवार वालों से बात कर रहा हूं। सात दिन पहले तक मेरी बात परिजनों से होती रही, लेकिन अब उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा है। मन बेचैन है। कोई अनहोनी की आशंका है। वहां की स्थिति बेहद ही खराब है।’ प्रिय रंजन आगे बताते हैं कि ‘जब हमारी बात हुई, तब परिजन काफी डरे-सहमे थे। बता रहे थे कभी भी कोई भी घर में घुस जाता है। महिलाओं-लड़कियों के साथ जबरदस्ती करने लगता है। कहीं कोई हिन्दू मिल जाए तो लाठी-डंडे से पीटने लगते हैं। हम भारत सरकार से मांग करते हैं कि सरकार हमारे परिवार और बांग्लादेश के हिंदुओं के लिए कुछ करे। उन्हें इंडिया लाया जाए।’ हिंदू बहू-बेटियों का घर से बाहर निकलना हुआ मुश्किल- प्रिय रंजन शर्मा प्रिय रंजन शर्मा आगे बताते हैं कि, ‘जब परिवार के लोगों से बात हो रही थी तो उन लोगों ने बताया कि जब भी हिंदू लोग घर से बाहर निकल रहे, 10-15 की संख्या में निकल रहे। घर से निकलने से पहले आसपास की जानकारी लेते हैं कि कहीं मुसलमान लोग हिंदुओं के साथ मारपीट तो नहीं कर रहे या हिन्दुओं पर हमले की योजना तो नहीं बना रहे हैं। जितनी जल्दी संभव होता है, बाजार का काम निपटा कर घर लौट आते हैं। रात में तो वो घर से बाहर निकलते नहीं है। प्रिय रंजन ने आगे बताया कि, ‘जहां मेरा परिवार रहता है, वहां हिंदू परिवार अपनी बहू-बेटियों को घर से बाहर नहीं जाने देते हैं। पढ़ाई-लिखाई पूरी तरह ठप हो चुकी है। लड़कियां तो बाहर निकल ही नहीं सकतीं, केवल लड़के ही बाहर जा पाते हैं। कई हिंदू परिवारों को मजबूर किया जा रहा है कि वो टोपी और लुंगी पहनें।’ हमें चिंता सता रही कि परिजन जिंदा हैं या मार दिए गए- शंकर दास इसी मुहल्ले में थोड़ी ही दूरी पर एक दरवाजे पर काफी निराश बैठे मिले शंकर दास। उनके चाचा और मामा बांग्लादेश के खुलना में रहते हैं। वे बताते है कि हालात बिगड़ने के बाद हम अपने परिजनों से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन किसी का फोन नहीं लगा। तब से घर के सभी लोग परेशान हैं। शंकर दास बताते हैं कि, ‘हम भाग्यशाली हैं कि हम इंडिया में आ गए और हमें यहां शरण मिल गया। हमें अपने परिवार वालों के लिए दुख होता है। हमारे मामा, चाचा और उनका पूरा परिवार वही है। उनसे कोई बात नहीं हो पा रही है, न ही कोई खबर मिल रही है। हमें चिंता सता रही है कि वह जिंदा हैं या मार दिए गए हैं।’ इंदिरा गांधी की पुनर्वास नीति के तहत हमें बसाया गया- शंकर दास शंकर दास आगे बताते हैं कि, ‘हमारा परिवार 1965 के आसपास बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) से भारत आया। पहले त्रिपुरा में कुछ समय रहे। फिर 1966 के करीब सहरसा पहुंचे। उसके बाद मरंगा (पूर्णिया) में हमें पुनर्वास के तहत बसाया गया। हमारा परिवार 1969 में नेपालगढ़ कॉलोनी आया। यह जगह इंदिरा गांधी सरकार की पुनर्वास नीति के तहत दी गई। कुल 67 परिवारों को उस समय यहां बसाया गया और हर परिवार को रहने के लिए घर और कुछ जमीन आवंटित की गई।’ 1971 के दिनों को याद कर रोने लगे रवींद्र बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ हो रहे अत्याचार पर अपने दिनों को याद कर 70 साल के रवींद्र चंद्रपाल रोने लगते हैं। वह बताते हैं कि जब हम बांग्लादेश में थे, तब तो हमने भी बहुत अत्याचार सहा था। हिंदू नाम लेना भी गलती हो जाती थी। कोई हमारे हाथ से कुछ लेता नहीं था, न कुछ देता था। वहां हिंदुओं को बहुत अपमान झेलना पड़ा। हम लोगों को सिर्फ इसलिए सताया गया था कि हम पूजा करते थे, मंदिर जाते थे। जबकि हमने कभी किसी के धर्म को बुरा नहीं कहा, न किसी से झगड़ा किया।’ हमारे परिजन बांग्लादेश में, उनसे कोई संपर्क नहीं हो रहा- रवींद्र चंद्रपाल रवींद्र चंद्रपाल आगे बताते हैं कि, ‘इंदिरा गांधी के समय में पुनर्वास हुआ। मैं खुद 1962 में आया था। हमारे परिवार के कुछ लोग आज भी बांग्लादेश में हैं। उनसे कोई संपर्क नहीं हो रहा है। मेरा बड़ा भाई अब त्रिपुरा में है। जो इंडिया आ गए, वो बच गए। जो वहां रह गए, आज उनकी हालत काफी खराब है। रवींद्र चंद्रपाल आगे कहते हैं कि, ‘हमारा धर्म तो मानवता सिखाता है। हम कहते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश सब एक हैं। जैसे हर आदमी ईश्वर की संतान है। मगर वहां ऐसा महसूस ही नहीं होने दिया गया कि हम भी इंसान हैं। मुसलमान लोग, जो पहले हमारे ही साथ खेतों में काम करते थे, खाना खाते थे। वही हमसे नफरत करने लगे।’ 1971 के जख्म फिर ताजा हो गए- शक्ति दत्त 70 साल के शक्ति दत्त भी अपने बांग्लादेश में बिताए दिनों को याद कर रो पड़ते हैं। यह बांग्लादेश के कोमिल्ला के रहने वाले है। जब 10 साल के थे तो इनके पिता धीरेष चंद्र दत्त और मां हेमा प्रभा दत्त अपने पूरे परिवार के साथ 1964 में बांग्लादेश से भाग कर भारत में आ गए। शक्ति दत्त बताते हैं कि, ‘हमें याद है। रात के समय में लोगों की भीड़ मेरे घर के तरफ आई। गांव के लोग अपने-अपने घर छोड़कर भागने लगे। पिताजी मेरी मां से बोले जल्दी घर से भागो, नहीं तो ये लोग मार देंगे। फिर हम घर के सारे समान छोड़कर भाग गए। हमारे साथ कई लोग भाग रहे थे। लोगों की भीड़ गांव में दाखिल हुई। जो लोग घर में थे, उनको घर से बाहर निकाल कर मार दिया। जो महिलाएं थी, उनके साथ रेप किया और घरों में आग लगा दिया। वह रात उन लोगों ने गांव के बाहर ही बिताई। अगले सुबह पिताजी बोले कि अब वापस नहीं लौटेंगे।’ हम हर रोज पैदल चलते थे। पिताजी मुझे कंधे पर बैठाकर पैदल चलते थे। किसी भी तरह हम भारत में घुसे। पहले हम त्रिपुरा पहुंचे। त्रिपुरा के फूल कुमारी कैंप में शरणार्थी के तौर पर रहे। – शक्ति दत्त, बांग्लादेशी हिंदुओं के परिजन भारत सरकार ने जमीन देकर कराया था पुनर्वास शक्ति दत्त के मुताबिक, उन्हें 1965 में सहरसा के शरणार्थी कैंप में भेज दिया गया। सहरसा शरणार्थी कैंप में 2 साल तक रहने के बाद उन्हें 1967 में पूर्णिया कैंप में भेज दिया गया। पूर्णिया से 1969 में किशनगंज के नेपालगढ़ कॉलोनी में शरणार्थी के तौर पर आए। परिवार को सरकार ने 18-20 डिसिमल जमीन देकर पुनर्वास कराया और आज सभी भारतीय नागरिकता प्राप्त कर चुके हैं।’ शक्ति दत्ता को उनके पिताजी कहानी सुनाते थे कि जब पूर्वी पाकिस्तान यानी बांग्लादेश में हिंदुओं पर खूब अत्याचार होता था। ढाका में किसी बात को लेकर पूरे पूर्वी पाकिस्तान में हिंदुओं को टारगेट किया जा रहा था। जिसके बाद कई हिंदू परिवार देश छोड़ने के लिए मजबूर हो गए।
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