पुनौरा धाम में छठ मनाने दूर-दूर से आते श्रद्धालु:पुनौरा धाम: जहां छठ की आराधना के साथ गूंजती है सीता जन्मभूमि की आस्था

मिथिला की पवित्र भूमि पर बसा पुनौरा धाम छठ पर्व के दौरान श्रद्धा, भक्ति और सांस्कृतिक रंगों से सराबोर हो उठता है। यह वही पवित्र स्थान है जहां माता सीता ने जन्म लिया था। जहां की मिट्टी में आज भी आस्था का अमिट सुगंध बसता है। छठ के अवसर पर पुनौरा के प्रसिद्ध सीताकुंड में हर साल हजारों श्रद्धालु जुटते हैं। हाथों में डाला, माथे पर सिंदूर की रेखा और आंखों में भक्ति का प्रकाश। सूर्यास्त की बेला में जब आकाश सुनहरा हो उठता है, नदी की लहरें दीपों की लौ से चमकने लगती हैं, तो पूरा वातावरण किसी आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाता है। छठ गीतों की स्वर लहरियां, महिलाओं की सधी हुई आराधना और बच्चों की हंसी, सब मिलकर इस भूमि को जीवंत बना देती हैं। माता सीता से जुड़ी पौराणिक मान्यता स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, माता सीता ने खुद देव मूंगा घाट पर छठ पूजा की शुरुआत की थी। कहा जाता है कि लंका से लौटने के बाद माता ने इस पर्व को परिवार की समृद्धि और संतुलन के लिए प्रारंभ किया। इसी परंपरा से प्रेरित होकर लोगों ने पुनौरा के सीताकुंड में भी व्रत की शुरुआत की। आज भक्तजन दोनों स्थलों, देव मूंगा घाट और पुनौरा धाम को समान रूप से पवित्र मानते हैं। भक्तों का विश्वास है कि सीता कुंड में व्रत करने से परिवार में खुशहाली आती है, रोग दूर होते हैं और जीवन में समृद्धि का वास होता है। निर्मल जल और लोक आस्था का अद्भुत संगम सीताकुंड की सबसे बड़ी विशेषता उसका निर्मल और अविनाशी जल है। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, इस जल में कभी कीड़े नहीं लगते और यह सालभर शुद्ध बना रहता है। कुंड के उत्तर-पश्चिमी कोने को माता सीता के प्राकट्य स्थल के रूप में पूजा जाता है। श्रद्धालुओं का कहना है, ‘यह कुंड केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि सीता माता की करुणा और पवित्रता का प्रतीक है। जब हम यहां अर्घ्य देते हैं, तो लगता है मानो स्वयं जन-कन्या हमारी प्रार्थना सुन रही हैं।’ चार दिनों तक चलने वाला अनुशासन और तपस्या छठ व्रत केवल पर्व नहीं, बल्कि संयम, तप और आस्था का प्रतीक है।नहाय-खाय से लेकर खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य तक, हर चरण में अनुशासन और श्रद्धा झलकती है। महिलाएं बिना अन्न और जल के व्रत रखती हैं, घरों को शुद्ध किया जाता है, और पूजा में इस्तेमाल होने वाली हर सामग्री पवित्रता से तैयार की जाती है। सीतामढ़ी में इस दौरान पूरा बाजार छठ से जुड़ी सामग्रियों से सजा होता है, बास की सूप, फल, गन्ना, नारियल, टेकुआ और कद्दू भात की खुशबू हर गली में फैली रहती है। छठ में बेटियों की भूमिका, नई पीढ़ी में परंपरा की ज्योति इस वर्ष खास बात यह है कि सीतामढ़ी में कई सामाजिक संगठनों ने छठ पर्व को ‘बेटियों के जीवन का पर्व’ के रूप में मनाने की पहल की है। ‘छठ की अर्घ्य के साथ बेटी को जीवन दें, भ्रूण हत्या नहीं’, यह संदेश पुनौरा के घाटों से गूंज रहा है। युवतियों और छात्राओं के समूह ने सीता कुंड के किनारे पोस्टर लगाए हैं, जिन पर लिखा है, ‘जैसे सूर्य की किरणें जीवन को रोशन करती हैं, वैसे ही बेटियों को भी जीवन का अधिकार है।”यह पहल मिथिला की उस परंपरा को और मजबूती देती है, जहां सीता जैसी नारी शक्ति को पूजनीय माना गया है। सांस्कृतिक उत्सव और लोकगीतों की मधुरता पुनौरा धाम में छठ केवल व्रत का पर्व नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति का उत्सव भी है।संध्या के समय जब महिलाएं “केलवा जौं खोलs ना…” जैसे पारंपरिक गीत गाती हैं, तो पूरा परिसर भाव-विभोर हो जाता है। लोक कलाकार और स्कूल के बच्चे छठ महापर्व पर सीता और सूर्य पूजा की झांकियां प्रस्तुत करते हैं।दीपदान, सांस्कृतिक कार्यक्रम और लोकगीतों की प्रस्तुति से पूरा पुनौरा धाम मानो जीवंत मिथिला का प्रतिरूप बन जाता है। प्रशासन की तैयारी और सुरक्षा व्यवस्था सीतामढ़ी जिला प्रशासन ने इस वर्ष पुनौरा धाम और देव मूंगा घाट पर विशेष इंतजाम किए हैं।एसपी व डीएम की निगरानी में डाइवर्स, एनडीआरएफ टीम, पुलिस बल और महिला सुरक्षाकर्मी तैनात हैं। सफाई अभियान के तहत नगरपालिका ने कुंड के आसपास अस्थायी चेंजिंग रूम, मेडिकल कैंप और नियंत्रण कक्ष स्थापित किया है।व्रतियों की सुविधा के लिए घाटों पर सोलर लाइटें, बैरिकेडिंग और सीसीटीवी लगाए गए हैं। CO रमेश सिंह बताते हैं, ‘हमारा प्रयास है कि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो। छठ केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि मिथिला की पहचान है।’ आर्थिक दृष्टि से भी जुड़ा है पर्व छठ पर्व के दौरान स्थानीय बाजारों में करीब 15 से 20 करोड़ रुपए का कारोबार होता है।पुनौरा और आसपास के इलाकों में बांस के डाले, सुप, नारियल, गन्ना, फल और प्रसाद की वस्तुओं की बिक्री से ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ती है।स्थानीय दुकानदार गोविंद मंडल कहते हैं, छठ आने पर ऐसा लगता है मानो पूरा गांव जीवित हो उठा हो। चार दिन तक हर कोई काम में जुटा रहता है।”यही कारण है कि इस पर्व को यहां आस्था के साथ-साथ आत्मनिर्भरता का भी पर्व कहा जाता है। मिथिला की पहचान और महिला सशक्तिकरण का प्रतीक सीतामढ़ी का छठ व्रत मिथिला की उस सांस्कृतिक धारा को आगे बढ़ाता है, जिसमें नारी को शक्ति और सृजन का प्रतीक माना गया है।यहां की महिलाएं जिस अनुशासन और निष्ठा से छठ करती हैं, वह आने वाली पीढ़ियों को संस्कार सिखाता है। सीता की जन्मभूमि होने के कारण यह संदेश और गहरा हो जाता है, ‘जो भूमि नारी को देवी मानती है, वहां किसी बेटी का जीवन छिनना सबसे बड़ा अधर्म है।”छठ पर्व के माध्यम से यहां हर वर्ष यह संदेश नए रूप में जन्म लेता है, बेटी है तो ही घर, समाज और संस्कृति का अस्तित्व है। भोर की आरती और आस्था की चरम सीमा उषा अर्घ्य के समय जब पूर्व दिशा में सूर्य की पहली किरण झलकती है, तो श्रद्धालुओं के चेहरे पर अकल्पनीय तेज आ जाता है। सीताकुंड के जल में हजारों दीप तैरते हैं और महिलाएं हाथ जोड़कर प्रार्थना करती हैं, ‘सूर्य देव, हमारी संतानें सुरक्षित रहें, घर में सुख-शांति बनी रहे।’ यह दृश्य केवल पूजा नहीं, बल्कि आस्था का विराट रूप है। जिसे देखकर हर व्यक्ति भीतर तक भावुक हो जाता है। छठ के चार दिनों में पुनौरा धाम मिथिला की आत्मा बन जाता है। यहां धर्म, संस्कृति और लोकजीवन का ऐसा संगम होता है, जो शायद देश में कहीं और नहीं दिखता। जहां एक ओर महिलाएं व्रत करती हैं, वहीं पुरुष, बच्चे और बुजुर्ग उनके साथ सेवा में जुटे रहते हैं। सूर्य को अर्घ्य देने के साथ हर कोई अपने भीतर के अंधकार को मिटाने की कोशिश करता है, यही इस पर्व की आत्मा है। छठ, बेटी और सीता की भूमि का संदेश छठ पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन के प्रति सम्मान का उत्सव है। सीतामढ़ी की यह पवित्र भूमि हमें याद दिलाती है कि जहां सीता जन्मी थीं, वहां किसी बेटी को मरने नहीं दिया जा सकता। छठ की आराधना के साथ जब कोई मां सूर्य को अर्घ्य देती है, तो वह सिर्फ परिवार की खुशहाली नहीं, बल्कि हर बेटी के सुरक्षित भविष्य की भी कामना करती हैं।


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