नेशनल पीजी कॉलेज के इतिहास विभाग में ‘सिक्कों के माध्यम से इतिहास का अध्ययन’ विषय पर एक विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया। लखनऊ विश्वविद्यालय के प्राध्यापक प्रशांत श्रीवास्तव ने छात्रों को बताया कि पुराने सिक्के केवल लेन-देन का माध्यम नहीं, बल्कि इतिहास के महत्वपूर्ण साक्षी भी हैं। इस व्याख्यान ने छात्रों को इतिहास समझने का एक नया दृष्टिकोण प्रदान किया। कार्यक्रम की शुरुआत मुख्य वक्ता प्रशांत श्रीवास्तव के सम्मान से हुई। कॉलेज के प्राचार्य प्रो. देवेन्द्र के. सिंह ने उनका स्वागत किया, जबकि इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. आकृति कुमार ने कार्यक्रम का संचालन किया। व्याख्यान को पावरपॉइंट प्रस्तुति के माध्यम से समझाया गया, जिससे छात्रों के लिए विषय को समझना और भी आसान हो गया। सिक्कों से गुप्त काल के इतिहास को नई पहचान मिली व्याख्यान में बताया गया कि प्रारंभ में लोग वस्तु विनिमय प्रणाली का उपयोग करते थे,जिसका उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है। बाद में सिक्कों का प्रचलन शुरू हुआ,जिनमें एक निश्चित वजन, आकार और शासक की मुहर होती थी। प्रशांत श्रीवास्तव ने स्पष्ट किया कि सिक्कों ने कई ऐतिहासिक रहस्यों को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ‘काचा’ नामक सिक्कों से गुप्त काल के इतिहास को नई पहचान मिली,वहीं अनेक शासकों के आपसी संबंध और उनके अस्तित्व को भी इन्हीं सिक्कों के माध्यम से प्रमाणित किया जा सका है। सिक्के विजय गाथाओं को भी दर्शाते हैं सिक्कों के अध्ययन से राजाओं की वंशावली, उनकी उपाधियाँ और पारिवारिक संबंधों का पता चलता है। इनके आधार पर शासकों के शासन क्षेत्र और राजधानी का अनुमान भी लगाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, तांबे के सिक्कों का सीमित प्रसार किसी शासक के प्रभाव क्षेत्र की जानकारी देता है। इतिहास के साथ-साथ, सिक्के शासकों की शक्ति और विजय गाथाओं को भी दर्शाते हैं। समुद्रगुप्त के सिक्कों में उन्हें शेर और दरियाई घोड़े का शिकार करते हुए दिखाया गया है, जो उनकी विजय का प्रतीक है। अश्वमेध यज्ञ के बाद जारी किए गए विशेष सिक्के उनकी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं।सिक्कों में सामाजिक पहलू भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। कई सिक्कों पर माताओं और रानियों के नाम अंकित हैं, जो उस समय महिलाओं के सम्मान को दर्शाता है।

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