बयान-1 ‘अशोक चौधरी के असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति से जुड़े कागजात विश्वविद्यालय आयोग को भेजे गए हैं। प्रमाण पत्रों में कुछ कमियां थीं।’- सुनील कुमार, मंत्री शिक्षा विभाग बयान-2 ‘अशोक चौधरी से जुड़ी शिकायत मेरे पास नहीं आई है। आयोग की ओर से चयन करने के बाद की सूची शिक्षा विभाग को भेजी गई। वह लौट कर नहीं आई है।- गिरिश कुमार चौधरी, अध्यक्ष विश्वविद्यालय सेवा आयोग बिहार के शिक्षा विभाग से जुड़े दो आला अधिकारियों का एक मंत्री पर दिए दो अलग-अलग बयान के बाद दो तरह के सवाल उठ रहे हैं? इस पूरे विवाद को समझने के लिए हमने बिहार के शिक्षा विभाग के मंत्री, विश्वविद्यालय चयन आयोग और एक्सपर्ट से मामले को समझा। दैनिक भास्कर की एक्सक्लूसिव स्टोरी में पढ़िए आखिर विवाद कहां से शुरू हुआ, क्यों हुआ और आगे क्या कार्रवाई हो सकती है? पहले बात नियुक्ति और डिग्री पर विवाद की विश्वविद्यालय सेवा आयोग ने 2020 में 52 विषयों में असिस्टेंट प्रोफेसर की बहाली के लिए विज्ञापन निकाला था। 57 साल के मंत्री ने पॉलिटिकल साइंस विषय के लिए आवेदन भरा था। इस विषय के लिए 17 जून से 22 जून 2025 तक इंटरव्यू चला। रिजल्ट 24 जून 2025 को जारी हुआ। 280 पदों के लिए भर्ती होनी थी। 274 के लिए अभ्यर्थियों के नाम चुनकर सिफारिश की गई। SC वर्ग में 10वें स्थान पर अशोक चौधरी का नाम था। अनुभव प्रमाण पत्र की जांच पूरी नहीं होने के चलते बाकी अनारक्षित कैटेगरी के 2 अभ्यर्थियों को वेटिंग में रखा गया। बाद में आरोप लगे कि अशोक चौधरी के सर्टिफिकेट में कमियां हैं। इस मामले में शिक्षा विभाग के अधिकारी कैमरे के सामने बोलने से बच रहे हैं। 29 दिसंबर को जब शिक्षा मंत्री सुनील कुमार से अशोक चौधरी की नियुक्ति रोकने के संबंध में सवाल पूछा गया तो, उन्होंने कहा, ‘कुछ कमियां मिली हैं। हमने मामले को विश्वविद्यालय सेवा आयोग को भेजा है। हर बात को गहराई से देख रहे हैं।’ अब आयोग के अध्यक्ष से समझिए पूरा मामला भास्कर ने विश्वविद्यालय सेवा आयोग के चेयरमैन डॉ. गिरीश कुमार चौधरी से बात की। उन्होंने कहा, ‘हमने शिक्षा विभाग को सभी अभ्यर्थियों से जुड़े कागजात भेज दिए हैं। हमसे किसी ने अशोक चौधरी से जुड़ी शिकायत नहीं की है।’ गिरीश कुमार ने कहा, ‘शिकायत मिलने पर जांच कराते हैं। गड़बड़ी मिलने पर कार्रवाई होती है और उस अभ्यर्थी का चयन आयोग के स्तर से रद्द कर दिया जाता है। पॉलिटिकल साइंस विषय से जुड़े अभ्यर्थियों की लिस्ट नियम के अनुसार चयन कर शिक्षा विभाग को भेजी जा चुकी है।’ अब आगे क्या होगा? मामला शिक्षा विभाग और विश्वविद्यालय सेवा आयोग के बीच फंसा हुआ है। काफी किच-किच होने के बाद मामले को ठंडे बस्ते में डाला जा सकता है। अशोक चौधरी से जुड़े कागजात पूरे पाए जाएंगे और कोई गड़बड़ी नहीं मिलेगी तो नियुक्ति भी संभव है। चौधरी का नाम और पीएचडी दोनों सही अशोक चौधरी की नियुक्ति रोकने के पीछे दो तरह की बात कही जा रही है। पहला उनके दो नाम और दूसरा पीएचडी में गड़बड़ी। भास्कर ने दोनों मुद्दों की पड़ताल की। ये सच है कि अशोक चौधरी के दो नाम हैं, लेकिन सभी डॉक्यूमेंट पर यही लिखा हुआ है। भास्कर को मिली जानकारी के मुताबिक, अशोक चौधरी के पासपोर्ट में अशोक कुमार उर्फ अशोक चौधरी लिखा है। SDO के स्तर से जारी किए गए उनके जाति प्रमाण पत्र में भी उनका नाम अशोक कुमार उर्फ अशोक चौधरी लिखा है। इसके बाद हमने मगध यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रोफेसर शशि प्रताप शाही से बात की। चौधरी इन्हीं के अंडर में पीएचडी की डिग्री ली है। इनकी पीएचडी का विषय था- ‘बिहार विधानसभा में दलित महिलाओं की भूमिका’। शाही ने कहा, ‘पीएचडी का विषय समाज में महिलाओं की भूमिका में बदलाव से जुड़ा है। यह साफ है कि पीएचडी से जुड़ा कोई मामला नहीं है।’ नियुक्ति से पहले डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन की प्रक्रिया नियुक्ति से पहले विश्वविद्यालय सेवा आयोग की एक्सपर्ट कमेटी अभ्यर्थियों की ओर से दिए गए कागजातों की जांच करती है। इसके बाद अभ्यर्थी को अंक दिए जाते हैं। इसके आधार पर अभ्यर्थी को इंटरव्यू के लिए बुलाया जाता है। इंटरव्यू के बाद आयोग अभ्यर्थी की नियुक्ति के लिए सिफारिश करता है। इस पूरी प्रक्रिया के बाद रिजल्ट में अशोक चौधरी का नाम था। ये था ऑफिशियल अब पॉलिटिकल विवाद समझिए… क्यों अशोक चौधरी की बहाली पर हुआ विवाद? 2 पॉइंट मामला केवल एकेडमिक तक सीमित नहीं है। सूत्रों की मानें तो अशोक चौधरी की बहाली को लेकर हो रहे विवाद में राजनीति भी है। इसे 2 पॉइंट में समझिए… अशोक चौधरी के मामले में हो रही छीछालेदर को जेडीयू की इंटरनल पॉलिटिक्स का हिस्सा भी माना जा रहा है। अशोक चौधरी का कद दलित नेता के रूप में उभरा है। उनकी एक बेटी शांभवी चौधरी लोकसभा सांसद हैं। दूसरी बेटी की शादी एक बड़े नेता के बेटे से होने की बात चल रही है। इस सब को देखते हुए सूत्र बता रहे हैं दूसरी बेटी की शादी के बाद अशोक चौधरी की धाक जेडीयू में और बढ़ सकती है। ऐसे में कइयों को दिक्कत हो सकती है। इसलिए दलित पॉलिटिक्स के चलते भी उनकी ज्वॉइनिंग में रोड़ा अटकाया जा रहा हो। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि जेडीयू में अशोक चौधरी के बढ़ते कद के चलते कुछ नेताओं में असुरक्षा की भावना बनी रहती है। बिहार विश्वविद्यालय सेवा आयोग की इस बार की वैकेंसी में बाहरी की जगह बिहारी को ज्यादा प्राथमिकता दी गई है। पहले इंटरव्यू बोर्ड में ज्यादातर एक्सपर्ट बाहर के होते थे। इस बार कई एक्सपर्ट बिहार के थे। नतीजा बाहर के लोगों की भौंहे आयोग पर तनी हुई हैं। छोटी-छोटी गलतियों पर आलोचना हो रही है। ये लोग साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि बहाली नीट एंड क्लीन नहीं है। जानकारी है कि एक बाहरी लॉबी इस काम में लगी है। क्या हैं जेडीयू की इंटरनल पॉलिटिक्स के मायने? जेडीयू में अशोक चौधरी की गिनती नीतीश कुमार के करीबी नेताओं में होती है। कुछ दिनों से अशोक चौधरी के परिवार और नीतीश कुमार के बेटे निशांत के बीच करीबी ज्यादा दिख रही है। 28 दिसंबर को सीएम हाउस में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया गया था। उसमें अशोक चौधरी की बेटी और दामाद भी पहुंचे थे। निशांत के साथ तस्वीर सामने आई थी। यह सब एक तरफ और दूसरी तरफ इसकी चर्चा खूब है कि निशांत बिहार की राजनीति में कब एक्टिव होंगे। जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने कहा था, ‘पार्टी के लोग और समर्थक चाहते हैं कि निशांत पार्टी में आकर काम करें। यह फैसला उनको लेना है कि कब पार्टी में कामकाज शुरू करते हैं।’ अशोक चौधरी कह चुके हैं कि ‘जिस दिन नीतीश कुमार और निशांत चाहेंगे, उस दिन से निशांत पार्टी में एक्टिव हो जाएंगे।’ जेडीयू में ये खास नेता दलित वर्ग से आते हैं श्याम रजक: जेडीयू में श्याम रजक की पहचान बड़े दलित नेता के रूप में है। वह आरजेडी में जाकर वापस आए हैं। फुलवारीशरीफ विधानसभा से विधायक हैं। नई सरकार में मंत्री नहीं बनाए गए हैं। खरमास के बाद मंत्रिमंडल विस्तार में श्याम रजक को शामिल किया जा सकता है। रजक कई बार मंत्री बने। सुनील कुमार: शिक्षा मंत्री और पूर्व आईपीएस सुनील कुमार पिछली नीतीश सरकार में भी शिक्षा मंत्री थे। एक दिन पहले सुनील कुमार को इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ एजुकेटर्स फॉर वर्ल्ड पीस की तरफ से बेस्ट एजुकेशन मिनिस्टर ऑफ द ईयर अवॉर्ड दिया गया है। अशोक चौधरी: श्याम रजक जब जेडीयू छोड़कर आरजेडी में गए तब बतौर दलित नेता अशोक चौधरी का कद जेडीयू में बढ़ा। अब दोनों जेडीयू में हैं। अशोक चौधरी के पास अभी ग्रामीण कार्य विभाग है। नीतीश कुमार पर बेटी शांभवी के साथ मिलकर एक किताब लिख चुके हैं। डॉ. आलोक कुमार सुमन: गोपालगंज से लोकसभा सांसद हैं। 2019 और 2024 में भी उन्होंने लोकसभा का चुनाव जीता था। महेश्वर हजारी: समस्तीपुर के कल्याणपुर से जेडीयू के विधायक हैं। बिहार सरकार मंत्री रह चुके हैं। नई सरकार में मंत्री पद नहीं मिला है। रत्नेश सदा: सहरसा के सोनवर्षा से जेडीयू विधायक हैं। पहले मंत्री रह चुके हैं, लेकिन इस बार मंत्री पद नहीं मिला है। अशोक राम: लंबे समय तक कांग्रेस के नेता रहे। छह बार विधान सभा का चुनाव जीते। मंंत्री भी रहे। अगस्त 2025 में कांग्रेस छोड़ जेडीयू में शामिल हो गए। नीतीश कुमार ने दलित कार्ड खेलने के लिए अशोक राम के लिए जेडीयू का दरवाजा खोला था। इन्होंने दरभंगा के कुशेश्वर स्थान से अपने बेटे अतिरेक कुमार को जेडीयू का टिकट दिलवाया। वह चुनाव जीत गए हैं। राजद की मांग- मंत्री पद से इस्तीफा दें अशोक चौधरी राजद ने राजभवन को पत्र लिखा है। मांग की है कि अशोक चौधरी मंत्री पद से इस्तीफा दें। निष्पक्ष जांच के लिए उनका इस्तीफा जरूरी है। आरजेडी ने मुख्य रूप से अशोक चौधरी के नाम और पीएचडी की डिग्री पर सवाल उठाया है। राज्यपाल को पत्र लिखने वाले आरजेडी के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रो. नवल किशोर यादव से भास्कर ने बात की। पूछा कि आपने अशोक चौधरी की पीएचडी डिग्री की जांच की मांग की है। क्या आधार है? नवल किशोर ने कहा, ‘मैंने नहीं देखा है कि उनके किस डॉक्यूमेंट में गड़बड़ी है। शिक्षा मंत्री ने कहा है कि कागजात में कमियां पाई गई हैं।’ अशोक चौधरी ने साधी चुप्पी, टाल दी प्रेस कॉन्फ्रेंस अशोक चौधरी ने इस मामले में चुप्पी साध ली है। वह वोकल नेता रहे हैं। चुप बैठने वालों में उनकी गिनती नहीं होती। अशोक चौधरी मंगलवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले थे, लेकिन ऐसा नहीं किया। कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता असित नाथ तिवारी ने कहा, ‘मंत्री अशोक चौधरी जवाब दें कि उनकी डिग्री फर्जी नहीं है। पीएचडी पूर्णकालिक डिग्री है। अशोक चौधरी ने कब इसके लिए क्लास किया?’ पिता का सपना पूरा करना चाहते हैं अशोक चौधरी अशोक चौधरी पॉलिटिक्स में काफी समय से एक्टिव हैं। बिहार कांग्रेस अध्यक्ष रह चुके हैं। ऐसे में लोगों के मन में सवाल है कि वह बिहार सरकार के मंत्री रहने के बाद भी असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर क्यों बहाल होना चाहते हैं? यह मामला अशोक चौधरी के सेंटिमेंट से जुड़ा है। उनके करीबी बताते हैं कि अशोक चौधरी के पिता महावीर चौधरी पॉलिटिकल साइंस से एमए थे। पॉलिटिक्स की अनिश्चितता से वे वाकिफ थे। उन्होंने बेटे से कहा था कि प्रोफेसर की नौकरी के लिए प्रयास करें। असिस्टेंट प्रोफेसर बनना अशोक चौधरी के लिए पिता का सपना पूरा करने जैसा है। नोट- भास्कर रिपोर्ट ने अशोक चौधरी को फोन किया। जवाब मिला कि एक दिन बाद उनसे बात हो सकती है। उनका पक्ष आने पर अपडेट किया जाएगा।
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