अयोध्या के प्रसिद्ध चक्रवर्ती सम्राट दशरथ के राजमहल, बड़ा स्थान पर श्रीराम जन्मोत्सव के अवसर पर आयोजित श्रीराम कथा श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक चेतना का अनुपम समागम दिख रहा है। कथा स्थल पर उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ और गूंजते रामनाम ने सम्पूर्ण वातावरण को भक्तिमय बना दिया। भक्ति केवल उपासना नहीं, बल्कि जीव और ईश्वर के मध्य प्रेम का वह दिव्य सेतु
कथा व्यास सत्यम पीठाधीश्वर नरहरिदास भक्तमाली दास महाराज ने नवधा भक्ति का अत्यंत सूक्ष्म, दार्शनिक एवं भावपूर्ण निरूपण करते हुए कहा कि भक्ति केवल उपासना की विधि नहीं, बल्कि जीव और ईश्वर के मध्य प्रेम का वह दिव्य सेतु है, जो साधक को सांसारिक बंधनों से मुक्त कर परम शांति की ओर अग्रसर करता है। उन्होंने नवधा भक्ति—श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन—के प्रत्येक रूप का जीवनोपयोगी और सहज व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि ‘श्रवण’ के माध्यम से जब भक्त भगवान की लीलाओं का श्रवण करता है, तो उसके अंतःकरण की मलिनता दूर होती है। ‘कीर्तन’ में प्रभु के नाम का गान मन को एकाग्र करता है, वहीं ‘स्मरण’ से भक्त हर क्षण ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करता है। ‘पादसेवन’ और ‘अर्चन’ भक्ति को कर्म से जोड़ते हैं, जबकि ‘वंदन’ विनम्रता का प्रतीक है। ‘दास्य’ भाव में भक्त स्वयं को प्रभु का सेवक मानकर अहंकार का त्याग करता है, ‘सख्य’ में वह ईश्वर से आत्मीय संबंध स्थापित करता है और अंततः ‘आत्मनिवेदन’ में स्वयं को पूर्णतः प्रभु के चरणों में समर्पित कर देता है।
यह भव्य आयोजन स्वामी देवेंद्रप्रसादाचार्य महाराज के सानिध्य एवं जगदगुरु अर्जुनद्वाराचार्य रामभूषण देवाचार्य कृपालु के संयोजन में संपन्न हो रहा है। कथा के इस विशेष दिवस पर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय सहित सैकड़ों संत-महंत, धर्माचार्य और श्रद्धालु उपस्थित रहे। उनकी उपस्थिति ने आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान की। जगदगुरु अर्जुनद्वाराचार्य रामभूषण देवाचार्य कृपालु ने अंग वस्त्र और रामलला का चित्रपट देकर उनका स्वागत किया। चंपत राय को भगवान ने उनको इसी विशेष कार्य के लिए भेजा है-जगदगुरु कृपालु कृपालु महाराज ने कहा कि ट्रस्ट महासचिव चंपत राय ने न केवल भव्य राम मंदिर का निर्माण कराया है।बल्कि लाखों श्रद्धालुओं के स्वागत और प्रबंधन का उनका तंत्र बेहद सराहनीय है।ऐसा लगता है कि इस धरा पर भगवान ने उनको इसी विशेष कार्य के लिए भेजा है।
विश्राम बेला में स्वामी देवेंद्रप्रसादाचार्य जी महाराज ने श्रीराम कथा की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि यह कथा स्वयं श्रीराम का प्रसाद है। उन्होंने भावपूर्ण शब्दों में कहा कि प्रसाद का महत्व उसकी मात्रा में नहीं, बल्कि उसकी भावना में निहित होता है। अतः श्रीराम कथा का जितना भी रसास्वादन किया जाए, वह सदैव अल्प ही प्रतीत होता है और पुनः सुनने की अभिलाषा जागृत करता है। कथा पंडाल में श्रद्धालुओं की भाव-विभोर उपस्थिति, संतों के ओजस्वी प्रवचन और रामनाम की अनुगूंज ने अयोध्या की पावन धरा को त्रेतायुगीन आध्यात्मिकता से अनुप्राणित कर दिया। सम्पूर्ण आयोजन ने न केवल धार्मिक आस्था को सुदृढ़ किया, बल्कि समाज में नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिक चेतना के प्रसार का भी संदेश दिया।

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