उत्तर प्रदेश में दवा विक्रेताओं ने नारकोटिक्स विभाग और एफडीए की संयुक्त जांच के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया है। होलसेलर एंड रिटेलर केमिस्ट एसोसिएशन ने आरोप लगाया है कि लाइसेंस सत्यापन के नाम पर उनका उत्पीड़न किया जा रहा है। एसोसिएशन के अनुसार, उत्तर प्रदेश में लगभग 2.5 लाख लाइसेंसधारी दवा विक्रेता हैं, जिनसे करीब पांच लाख परिवार जुड़े हुए हैं। हाल ही में, एफडीए विभाग की प्रमुख सचिव रोशन जैकब ने पूरे प्रदेश में लाइसेंस की जांच का आदेश दिया है, जिसके बाद ड्रग विभाग के अधिकारियों के साथ नारकोटिक्स विभाग के अधिकारी भी बाजारों में सत्यापन के लिए पहुंच रहे हैं।
दवा विक्रेताओं का कहना है कि वे नशे का कारोबार नहीं करते, बल्कि जीवनरक्षक दवाएं बेचते हैं। उनका आरोप है कि जांच के नाम पर उन्हें अपराधियों जैसा व्यवहार किया जा रहा है, जिससे उन्हें अनावश्यक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। एसोसिएशन ने बताया कि प्रत्येक पांच वर्ष में लाइसेंस का सत्यापन होता है और व्यापारी सभी संबंधित दस्तावेज पोर्टल पर अपलोड करते हैं, जिसके बाद लाइसेंस का नवीनीकरण होता है। ऐसे में बार-बार जांच के नाम पर भ्रष्टाचार और उत्पीड़न नहीं होना चाहिए। शेड्यूल एच1 के तहत आने वाली दवाएं कंपनियां बनाती हैं और ये बिल के साथ खरीदी व बेची जाती हैं। इन दवाओं का 95% उपयोग माइग्रेन, डिप्रेशन, ऑपरेशन, हृदय रोग और ट्रॉमा जैसी बीमारियों के इलाज में होता है। इनके बिना कई बीमारियों का इलाज संभव नहीं है। यदि सरकार को लगता है कि इन दवाओं का दुरुपयोग नशे के लिए हो रहा है, तो उन्हें कंपनी स्तर पर ही बंद कर देना चाहिए। नारकोटिक्स विभाग और पुलिस विभाग का दवा विक्रेताओं के यहां दखल नहीं होना चाहिए। एसोसिएशन ने सुझाव दिया कि नारकोटिक्स के अंतर्गत आने वाली दवाओं की बिक्री सरकारी नियंत्रण में होनी चाहिए और इन्हें बेचने वाले व्यक्ति भी सरकारी होने चाहिए, जिससे इनके दुरुपयोग की संभावना शून्य हो जाएगी। दवा विक्रेताओं ने यह भी कहा कि ड्रग विभाग एक बहुत बड़ा विभाग है और वह लगातार दवा व्यापारियों की जांच करता रहता है। ऐसे में अन्य विभागों की दखलंदाजी की आवश्यकता क्यों है, इस पर समीक्षा की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि ड्रग विभाग के पास सीयूजी नंबर भी नहीं हैं।

Leave a Reply