डॉ. शकुन्तला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय में सोमवार को हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग द्वारा एक राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें समकालीन समय, समाज और साहित्य से जुड़े गंभीर मुद्दों पर दिनभर गहन मंथन हुआ। शाम को एक कवि सम्मेलन ने माहौल को जीवंत बना दिया। सम्मेलन की शुरुआत अकादमिक सत्रों से हुई। इसमें देश-विदेश से आए आचार्य, शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों ने ‘समकालीन समय, समाज और साहित्य: विमर्श, संवेदना, दिव्यांगता पुनर्वास एवं सामाजिक दायित्व’ विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए। सभागार में समाज के बदलते स्वरूप, संवेदनाओं और जिम्मेदारियों पर गहन चर्चा हुई। शिक्षा और साहित्य बदलाव की सबसे मजबूत कड़ी मुख्य अतिथि राज्य दिव्यांगजन आयुक्त प्रो. हिमांशु शेखर झा ने अपने संबोधन में कहा कि दिव्यांगजन सहानुभूति के नहीं, बल्कि समान अवसर और सम्मान के हकदार हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि समावेशी समाज केवल नीतियों से नहीं, बल्कि सोच और व्यवहार में बदलाव से बनता है। शिक्षा और साहित्य इस बदलाव की सबसे मजबूत कड़ी हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं पद्मश्री विद्या विन्दु सिंह ने महिलाओं की स्थिति पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि समाज में बदलाव के बावजूद सोच में परिवर्तन अभी भी आवश्यक है। साहित्य ही वह माध्यम है जो महिलाओं के संघर्ष और सशक्तिकरण को सशक्त आवाज प्रदान करता है। कवि सम्मेलन में हंसी, व्यंग्य और संवेदना से गूंजा विशिष्ट अतिथियों ने भी अपने विचार साझा किए। डॉ. अमित कुमार राय ने दिव्यांगता को सामाजिक दृष्टिकोण से जोड़ते हुए सकारात्मक सोच की आवश्यकता पर बल दिया। प्रो. कालीचरण स्नेही ने दलित और आदिवासी समाज की समस्याओं को साहित्य के माध्यम से सामने लाने पर जोर दिया। सम्मेलन का एक खास आकर्षण अंतरराष्ट्रीय भागीदारी रही। अमेरिका, नॉर्वे और थाईलैंड से आए आचार्यों ने अपने व्याख्यान दिए, जबकि युवा शोधार्थियों ने शोध पत्र प्रस्तुत कर अकादमिक माहौल को समृद्ध किया।समापन सत्र में कवि सम्मेलन शुरू होते ही माहौल पूरी तरह बदल गया। हंसी, व्यंग्य और संवेदना के रंगों से सजी इस शाम में कवियों ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को बांधे रखा। पंकज प्रसून ने महंगाई पर चुटीले अंदाज में तंज कसते हुए खूब ठहाके बटोरें।

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