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डायबिटीज से भारत में 101 मिलियन प्रभावित, मगनभाई पटेल का जागरूकता और रोकथाम पर जोर

हाल ही में अहमदाबाद के चांगोदर में स्थित श्रीमती एन.एम.पाडालिया फार्मेसी कॉलेज में “वर्ल्ड डायबिटीज डे” के अवसर पर “डायबिटीज केयर तक पहुंच–एक अधिकार,न कि कोई खास अधिकार” विषय पर एक सेमिनार आयोजीत किया गया। इस सेमिनार की अध्यक्षता कॉलेज के मैनेजिंग ट्रस्टी एव गुजरात के जानेमाने समाजसेवी उद्योगपति मगनभाई पटेलने की। इस सेमिनार का मुख्य उदेश्य स्टूडेंट्स में डायबिटीज, इसके बढ़ते ग्लोबल बोझ और रोकथाम, डायग्नोसिस और इलाज की बराबर उपलब्धता के बारे में जागरूकता बढ़ाना था। इस सेमिनार में डॉ.गौरांग शाह और डॉ.विनय दरजी मुख्य अतिथि थे।सेमिनार में कॉलेज के प्रिंसिपल एव कन्वीनर डॉ.जितेंद्र भंगाले और ऑर्गेनाइजिंग सेक्रेटरी प्रो.नेहल त्रंबडिया मौजूद थे। पुरे सेमिनार का संकलन प्रो.सूरज चौहानने किया । इस सेमिनार में कॉलेज के फैकल्टी मेंबर डॉ.भूमि रावल, डॉ.नुसरत शेख,डॉ. विश्व पटेल,डॉ. स्वीटी चौधरी और प्रो.फोरम पटेल भी आयोजन कमिटी में शामिल थे। इस सेमिनार में कुल 150 प्रतिनिधिओने हिस्सा लिया। इस सेमिनार का उद्घाटन कॉलेज के मैनेजिंग ट्रस्टी मगनभाई पटेल और वहां मौजूद गणमान्य लोगों ने दिप प्रज्जवलित कर किया।
इस सेमिनार के अध्यक्ष मगनभाई पटेलने डायबिटीज के बारे में विस्तृत जानकारी देते हुए कहा कि डायबिटीज मेलिटस ग्रीक शब्द “डायबिटीज” से बना है, जिसका मतलब है साइफन-पासिंग और लैटिन शब्द मेलिटस जिसका मतलब है मीठा। पुराने ग्रीक, इंडियन और इजिप्टियन कल्चरने इस कंडीशन में यूरिन के मीठे नेचर का पता लगाया और इसलिए डायबिटीज मेलिटस शब्द बना। मेरिंग और मिंकोव्स्कीने साल 1889 में डायबिटीज के पैथोजेनेसिस में पैंक्रियास के रोल का पता लगाया। साल 1922 में, बैंटिंग, बेस्ट और कोलिप ने टोरंटो यूनिवर्सिटी में गायों के पैंक्रियास से इंसुलिन हॉर्मोन को प्यूरिफाई किया, जिससे साल 1922 में डायबिटीज का असरदार इलाज मिल सका। पिछले कुछ सालों में इस बढ़ती प्रॉब्लम से निपटने के लिए बहुत अच्छा काम हुआ है और कई खोजें और मैनेजमेंट स्ट्रेटेजी बनाई गई हैं। लेकिन बदकिस्मती से आज भी डायबिटीज देश और दुनिया भर में सबसे ज्यादा क्रॉनिक मेटाबोलिक डिसऑर्डर है, जिसमें इंसुलिन की कमी या इंसुलिन के खराब इस्तेमाल की वजह से शरीर में ब्लड शुगर लेवल बहुत ज्यादा हो जाता है। यह अमरीका में मौत का सातवां सबसे बड़ा कारण है। डायबिटीज मेलिटस (DM) एक मेटाबोलिक बीमारी है जिसमें ब्लड शुगर लेवल असामान्य रूप से ज्यादा हो जाता है। DM की कई कैटेगरी हैं, जिनमें टाइप-1, टाइप-2, Maturity Onset Diabetes of the Young (MODY)), गर्भावस्थाजन्य डायबिटीज,नियोनेटल डायबिटीज, और एंडोक्राइनोपैथी, स्टेरॉयड के इस्तेमाल वगैरह से होने वाले दूसरे कारण शामिल हैं। DM के मुख्य सबटाइप टाइप-1 डायबिटीज मेलिटस (T1DM) और टाइप-2 डायबिटीज मेलिटस (T2DM) हैं। T1DM बच्चों या किशोरों में होता है, जबकि T2DM व्रुद्ध और बुजुर्ग लोगों को प्रभावित करता है, जिन्हें खराब लाइफस्टाइल और खाने-पीने की चीजों की वजह से लंबे समय तक हाइपरग्लाइसीमिया रहता है। T1DM और T2DM का पैथोजेनेसिस बहुत अलग है और इसलिए हर टाइप के अलग-अलग कारण, लक्षण और इलाज होते हैं।
पैंक्रियास में एंडोक्राइन सेल्स के दो मुख्य सब-क्लास होते हैं। बीटा सेल्स जो इंसुलिन बनाती हैं और अल्फा सेल्स जो ग्लूकागन निकालती हैं। बीटा और अल्फा सेल्स ग्लूकोज के माहौल के हिसाब से अपने हार्मोन निकलने के लेवल को लगातार बदलते रहते हैं। इंसुलिन और ग्लूकागन के बीच बैलेंस के बिना, ग्लूकोज का लेवल गलत तरीके से बिगड़ जाता है। DM के मामले में, इंसुलिन या तो नहीं होता या उसका काम (इंसुलिन रेजिस्टेंस) खराब हो जाता है, जिससे हाइपरग्लाइसेमिया हो जाता है।
T1DM की पहचान पैंक्रियास में बीटा सेल्स के खत्म होने से होती है, जो आमतौर पर एक ऑटोइम्यून प्रोसेस की वजह से होता है। इसका नतीजा यह होता है कि बीटा सेल्स पूरी तरह खत्म हो जाते हैं और इसके कारण इंसुलिन नहीं होता या बहुत कम हो जाता है। T2DM में इंसुलिन लेवल और इंसुलिन सेंसिटिविटी के बीच असंतुलन के कारण इंसुलिन की फंक्शनल कमी हो जाती है। इंसुलिन रेजिस्टेंस कई वजहों से होता है लेकिन आमतौर पर मोटापे और उम्र बढ़ने के साथ बढ़ता है। दोनों तरह के लिए जेनेटिक बैकग्राउंड एक रिस्क फैक्टर के तौर पर जरूरी है। जैसे-जैसे ह्यूमन जीनोम की और खोज की जा रही है, DM के लिए रिस्क देने वाले अलग-अलग लोकाई खोजे जा रहे हैं। पॉलीमॉर्फिज्म T1DM के रिस्क पर असर डालने के लिए जाने जाते हैं, जिसमें मेजर हिस्टोकंपैटिबिलिटी कॉम्प्लेक्स (MHC) और ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन (HLA) शामिल हैं। T2DM में जेनेटिक्स और लाइफस्टाइल के बीच ज्यादा कॉम्प्लेक्स इंटरैक्शन होता है। इस बात के साफ सबूत हैं कि T2DM का हेरेडिटरी प्रोफाइल T1DM से ज्यादा मजबूत है। इस बीमारी वाले ज्यादातर मरीजों के माता-पिता में से कम से कम एक को T2DM होता है। मोनोजायगोटिक जुड़वां बच्चों में, जिनमें एक जुड़वां प्रभावित होता है, दूसरे जुड़वां को अपनी पूरी जिंदगी में T2DM होने का 90% चांस होता है। आज तक, T2DM के रिस्क या प्रोटेक्शन में योगदान देने वाले लगभग 50 पॉलीमॉर्फिज्म के बारे में बताया गया है। ये जीन DM की ओर ले जाने वाले अलग-अलग रास्तों में शामिल प्रोटीन को एनकोड करते हैं, जिसमें पैंक्रियाटिक डेवलपमेंट, इंसुलिन सिंथेसिस, सिक्रीशन और डेवलपमेंट, बीटा सेल्स में एमाइलॉयड डिपॉजिशन, इंसुलिन रेजिस्टेंस और खराब ग्लूकोनियोजेनेसिस रेगुलेशन शामिल हैं।
टाइप-1 डायबिटीज (T1DM) की पहचान इंसुलिन पर निर्भर होने से होती है, जिसका मतलब है कि यह आमतौर पर टीनएज या बचपन में होता है, और इसके लिए रोज इंसुलिन इंजेक्शन की जरूरत होती है। 2017 में, टाइप 1 डायबिटीज वाले 9 मिलियन लोग थे, जिनमें से ज्यादातर हाई-इनकम वाले देशों में रहते हैं, जहां इसका कोई इलाज नहीं है।
टाइप 2 डायबिटीज (T1D2) बताता है कि किसी व्यक्ति का शरीर एनर्जी के लिए शुगर (ग्लूकोज) का इस्तेमाल कैसे करता है और इसका क्या असर होता है। यह शरीर को इंसुलिन का ठीक से इस्तेमाल करने से रोकता है, जिसका अगर इलाज न किया जाए तो ब्लड शुगर लेवल बढ़ सकता है। ज्यादा वजन होना, पूरी एक्सरसाइज न करना, अनियमित खाना जैसे कारण हैं,जिनसे टाइप-2 डायबिटीज हो सकती है। टाइप-2 डायबिटीज के सबसे बुरे असर को रोकने के लिए जल्दी पता लगाना जरूरी है। डायबिटीज का जल्दी पता लगाने का सबसे अच्छा तरीका है कि हेल्थकेयर प्रोवाइडर से रेगुलर चेकअप और ब्लड टेस्ट करवाएं। डायबिटीजवाले 95% से ज्यादा लोगों को टाइप-2 डायबिटीज होती है। टाइप-2 डायबिटीज को पहले नॉन-इंसुलिन-डिपेंडेंट या एडल्ट-ऑनसेट कहा जाता था। अब तक, इस तरह की डायबिटीज सिर्फ बड़ों में देखी जाती थी, लेकिन अब यह बच्चों में भी तेजी से देखी जा रही है।
इसके अलावा, हाइपरग्लाइसीमिया भी एक तरह का डायबिटीज है जिसे गर्भावस्था डायबिटीज कहते हैं। इसमें ब्लड ग्लूकोज लेवल नॉर्मल से ज्यादा होता है लेकिन डायबिटीज के डायग्नोसिस से कम होता है। जेस्टेशनल डायबिटीज प्रेग्नेंसी के दौरान होती है। डायबिटीजवाली गर्भवती महिलाओं को प्रेग्नेंसी और डिलीवरी के दौरान कॉम्प्लीकेशंस का ज्यादा रिस्क होता है। इन महिलाओं और शायद उनके बच्चों को भी भविष्य में टाइप-2 डायबिटीज होने का ज्यादा रिस्क होता है। गर्भावस्था डायबिटीज का डायग्नोसिस प्रीनेटल स्क्रीनिंग से होता है, बताए गए लक्षणों से नहीं।
इम्पेयर्ड ग्लूकोज टॉलरेंस (IGT) और इम्पेयर्ड फास्टिंग ग्लाइसीमिया (IFG) नॉर्मल और डायबिटीज के बीच के बदलाव के बीच के स्टेज हैं। IGT या IFG वाले लोगों में टाइप-2 डायबिटीज होने का खतरा ज्यादा होता है। टाइप-2 डायबिटीज को रोकने या देर से शुरू करने का सबसे अच्छा तरीका लाइफस्टाइल में बदलाव करना है। टाइप-2 डायबिटीज को रोकने के लिए रेगुलर बॉडी वेट बनाए रखना और उस पर नजर रखना, हर हफ्ते कम से कम 150 मिनट हल्की-फुल्की एक्सरसाइज, योग, प्राणायाम करके फिजिकली एक्टिव रहना, हेल्दी और पौष्टिक खाना खाना, मीठा और फैटी खाना न खाना और तंबाकू और शराब से बचना जरूरी है।
टाइप-1 डायबिटीजवाले लोगों को स्वस्थ रहने के लिए इंसुलिन इंजेक्शन की जरूरत होती है,जबकि टाइप-2 डायबिटीजवाले लोगों को अपने ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करने के लिए दवाएं लेनी पड़ती हैं। इसमें इंसुलिन इंजेक्शन या दूसरी दवाएं शामिल हो सकती हैं, जैसे मेटफॉर्मिन, सल्फोनिल्यूरिया और सोडियम-ग्लूकोज को-ट्रांसपोर्टर। ब्लड शुगर कम करनेवाली दवाओं के साथ-साथ,डायबिटीजवाले लोगों को अक्सर अपना ब्लड प्रेशर कम करनेवाली दवाओं और कॉम्प्लीकेशंस का खतरा कम करने के लिए स्टैटिन की जरूरत होती है। डायबिटीज के असर का इलाज करने के लिए मेडिकल केयर की जरूरत हो सकती है,जैसे अल्सर के इलाज के लिए पैरों की देखभाल, किडनी की बीमारी की स्क्रीनिंग और रेटिनोपैथी (जिससे अंधापन हो सकता है) की जांच के लिए आंखों की जांच। डायबिटीज के आम लक्षणों में बहुत ज्यादा प्यास लगना, नॉर्मल से ज्यादाबार पेशाब जाना, धुंधला दिखना, थकान और अनजाने में वजन कम होना शामिल हैं। समय के साथ, डायबिटीज से ये कॉम्प्लीकेशंस हो सकती हैं। यह र्हदय,आंख,किडनी और नसों में ब्लड वेसल को नुकसान पहुंचा सकता है। डायबिटीजवाले लोगों को हार्ट अटैक, स्ट्रोक और किडनी फेलियर जैसी हेल्थ प्रॉब्लम्स का खतरा ज्यादा होता है। डायबिटीज आंखों में ब्लड वेसल को नुकसान पहुंचा सकती है और इंसान हमेशा के लिए अपनी आंखों की रोशनी भी खो सकता है। डायबिटीजवाले कई लोगों को खराब ब्लड फ्लो की वजह से पैरों में भी दिक्कत होती है। इससे पैरों में अल्सर और कई बार पैर काटने तक की नौबत आ सकती है।
मगनभाई पटेलने आगे कहा कि ग्लोबल हेल्थ जर्नल “द लैंसेट” में छपी 2023 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 101 मिलियन लोग डायबिटीज से परेशान हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) के एक सर्वे के मुताबिक, देश में 136 मिलियन लोग (कुल आबादी का 15.3%) प्री-डायबिटीज से परेशान हैं। इसका मतलब है कि उनमें डायबिटीज के शुरुआती लक्षण हैं, अगर ये लोग तुरंत एक्शन नहीं लेते हैं, तो अगले पांच सालों में उनमें से 60% डायबिटीज के मरीज बन जाएंगे। हालांकि, अगर प्री-डायबिटीज का जल्दी पता चल जाए, तो सिर्फ 20 दिनों की सही कोशिश से इसे बढ़ने से रोका जा सकता है। इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन (IDF) के अनुसार, साल 2025 में दुनिया भर में लगभग 589 मिलियन लोग डायबिटीज से पीड़ित हो सकते है और यह भी अनुमान है कि साल 2050 तक यह संख्या बढ़कर 853 मिलियन हो सकती है। IDF की “डायबिटीज एटलस 2025” रिपोर्ट के अनुसार, आज दुनिया की 11.1% आबादी, या 9 में से 1 व्यक्ति डायबिटीज से पीड़ित है, और 40% से ज्यादा लोगों को अपनी स्थिति के बारे में पता नहीं है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2022 में 18 साल और उससे ज्यादा उम्र के 14% एडल्ट्स को डायबिटीज था, जो वर्ष 1990 में 7% था। वर्ष 2022 में 30 साल और उससे ज्यादा उम्र के आधे से ज्यादा (59%) एडल्ट्स डायबिटीज की दवा नहीं ले रहे थे। कम और मिडिल इनकम वाले देशों में डायबिटीज ट्रीटमेंट कवरेज सबसे कम था। वर्ष 2021 में डायबिटीज 1.6 मिलियन मौतों का सीधा कारण था और डायबिटीज से होने वाली 47% मौतें 70 साल की उम्र से पहले हुईं। किडनी की बीमारी से हुई 5,30,000 मौतें डायबिटीज की वजह से हुईं। वर्ष 2000 से दुनिया भर में डायबिटीज से होनेवाली मृत्यु की दर बढ़ रही है।
इस सेमिनार के चीफ गेस्ट डॉ.गौरांग शाहने “अंदर से बाहर तक डायबिटीज को समझना” टॉपिक पर अपनी स्पीच में विस्तृत जानकारी देते हुए कहा कि डायबिटीज एक क्रोनिक मेटाबोलिक डिसऑर्डर है, जिसमें इंसुलिन का कम प्रोडक्शन या इंसुलिन का ठीक से इस्तेमाल न होने की वजह से ब्लड शुगर लेवल बढ़ जाता है। उन्होंने ब्लड शुगर बैलेंस बनाए रखने में इंसुलिन के फिजियोलॉजिकल रोल और कैसे दिक्कतों से डायबिटीज होती है, इसके बारे में बताया। उन्होंने आगे बताया कि टाइप-1 डायबिटीज एक ऑटोइम्यून डिस्ट्रक्शन है जो इंसुलिन प्रोडक्शन को कम करता है, जबकि टाइप-2 डायबिटीज में इंसुलिन रेजिस्टेंस और उससे जुड़ी इंसुलिन की कमी होती है। उन्होंने दोनों के बीच का अंतर साफ किया। डॉ.गौरांग शाह ने टाइप-2 डायबिटीज के मुख्य रिस्क फैक्टर्स पर रोशनी डाली, जिसमें फिजिकल इनएक्टिविटी, मोटापा, फैमिली हिस्ट्री और उम्र जैसे लाइफस्टाइल फैक्टर्स शामिल हैं, जिन्हें हेल्दी लाइफस्टाइल में बदलाव करके रोका जा सकता है। उन्होंने गर्भावस्था डायबिटीज और प्री-डायबिटीज पर भी चर्चा की और फास्टिंग ग्लूकोज और HbA1c जैसे तरीकों का इस्तेमाल करके जल्दी स्क्रीनिंग और डायग्नोसिस पर जोर दिया।
इस सेमिनार में कीनोट स्पीकर के तौर पर अरिहंत स्कूल ऑफ फार्मेसी एंड बायोटेक रिसर्च इंस्टीट्यूट,गांधीनगर के प्रोफेसर और प्रिंसिपल डॉ.विनय दरजीने  “Insights into the Pathophysiology of Diabetes Mellitus” विषय पर जानकारी दी। उन्होंने इंसुलिन के स्ट्रक्चर, रिसेप्टर लेवल पर इंसुलिन के एक्शन, इंसुलिन रेजिस्टेंस और डायाबिटीज के पैथोफिजियोलॉजी में इसके रोल के बारे में विस्तार से बताया और डायाबिटीज के डायग्नोसिस के लिए मुख्य लक्षण और क्राइटेरिया भी बताए। यह लेक्चर स्टूडेंट्स के लिए बीमारी की बेसिक समझ हासिल करने में बहुत काम का था।
विश्व डायबिटीज दिवस के मौके पर हुए इस सेमिनार में कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ.जितेंद्र भंगालेने अपनी स्पीच मे बताया कि डायबिटीज आज सिर्फ एक बीमारी नहीं है, बल्कि यह लोगों की हेल्थ, समाज और पब्लिक हेल्थ के लिए एक गंभीर चुनौती बन गई है। हर साल 14 नवंबर को मनाए जानेवाले वर्ल्ड डायबिटीज डे का मुख्य मकसद डायबिटीज के बारे में जागरूकता फैलाना और लोगों में समय पर डायग्नोसिस, बचाव और सही इलाज के बारे में समझ बढ़ाना है। अपने भाषण में उन्होंने खास तौर पर स्टूडेंट्स को यह मैसेज दिया कि वे भविष्य के हेल्थ सिस्टम के पिलर हैं और इसलिए डायबिटीज जैसी लाइफस्टाइल बीमारियों पर साइंटिफिक समझ, जिम्मेदारी और इंसानियतवाला नजरिया बहुत जरूरी है। उन्होंने आगे कहा कि बैलेंस्ड डाइट, रेगुलर फिजिकल एक्सरसाइज, समय पर चेक-अप और स्ट्रेस मैनेजमेंट जैसी आसान आदतें अपनाकर डायबिटीज को रोका जा सकता है और अगर बीमारी का पता चल जाए तो इसे कंट्रोल में रखा जा सकता है। भले ही इंसुलिन की खोज को 100 साल से ज्यादा हो गए हैं, फिर भी दुनिया भर में लाखों लोग अभी भी सही इलाज, दवाओं और एजुकेशनल गाइडेंस से वंचित हैं, जो चिंता की बात है। इसलिए, हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स, स्टूडेंट्स और समाज के हर सदस्य की यह ड्यूटी है कि वे एकजुथ हो कर अवेयरनेस फैलाएं और मरीजों के प्रति हमदर्दी, समझ और सपोर्ट दिखाएं। अपनी स्पीच के आखिर में उन्होंने सभी से हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाने और समाज में डायबिटीज के बारे में एक पॉजिटिव मैसेज फैलाने की अपील की।
इस सेमिनार में कॉलेज के छात्रों ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए, जिसमें कुर्मी विपुल रंजन ने अपनी प्रस्तुति में कहा कि “विश्व डायबिटीज दिवस” सर फ्रेडरिक बैंटिंग के जन्मदिन पर पड़ता है, जिन्होंने 1921 में इंसुलिन की सह-खोज की थी। यह दिन हमें डायबिटीज के बारे में जागरूकता, रोकथाम और उचित प्रबंधन के महत्व की याद दिलाता है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के अनुसार, 100 मिलियन से अधिक भारतीयों को डायबिटीज है। शहरीकरण, गतिहीन जीवन शैली, स्वास्थ्य हानिकारक आहार और तनाव इस खतरनाक वृद्धि के मुख्य कारण हैं। अधिक चिंताजनक बात यह है कि डायबिटीज से पीड़ित दो में से एक व्यक्ति का निदान नहीं किया जाता है, जिसका अर्थ है कि वे बिना जाने उच्च रक्त शर्करा के साथ जी रहे हैं, जो उनके स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रहा है। 
पटेल हेतवीने डायबिटीज पर अपने विचार शेयर करते हुए कहा कि डायबिटीज एक ऐसी कंडीशन है जो तब होती है जब आपका पैंक्रियास काफी इंसुलिन नहीं बनाता या बिल्कुल नहीं बनाता, या जब आपका शरीर इंसुलिन के असर पर ठीक से रिस्पॉन्ड नहीं करता। ग्लूकोज मुख्य रूप से आपके खून में कार्बोहाइड्रेट से आता है और आपका शरीर इसे एनर्जी सोर्स के तौर पर इस्तेमाल करता है। आपका खून ग्लूकोज को आपके शरीर के सभी सेल्स तक एनर्जी के लिए ले जाता है। जब ग्लूकोज आपके खून में होता है, तो उसे अपनी आखिरी मंजिल तक पहुंचने के लिए एक “चाबी” की जरूरत होती है। यह चाबी इंसुलिन है। अगर आपका पैंक्रियास इंसुलिन नहीं बनाता है या आपका शरीर इसका ठीक से इस्तेमाल नहीं करता है, तो आपके ब्लडस्ट्रीम में ग्लूकोज जमा हो जाता है, जिससे ब्लड शुगर बढ़ जाता है।
 
कॉलेज स्टूडेंट अभिनव सिंहने डायबिटीज पर स्टैटिस्टिकल जानकारी देते हुए कहा कि यूनाइटेड स्टेट्स में लगभग 37.3 मिलियन लोगों को डायबिटीज है, जो आबादी का लगभग 11% है और दुनिया भर में 537 मिलियन से ज्यादा एडल्ट्स डायबिटीज से परेशान हैं। डायबिटीज इंग्लिश में पहला शब्द है जिसे साल 1425 के आस-पास एक मेडिकल टेक्स्ट में डायबिटीज के रूप में रिकॉर्ड किया गया था। इंसुलिन की खोज सर फ्रेडरिक बैंटिंग ने की थी। डायबिटीज के आम लक्षणों में ज्यादा प्यास लगना, पॉलीडिप्सिया, बार-बार पेशाब आना, नॉर्मल ब्लड शुगर लेवल (आमतौर पर 70-100 mg/dl के बीच) शामिल हैं, जबकि डायबिटीज के मरीजों के लिए ब्लड शुगर लेवल खाने से पहले 70-130 mg/dl और खाने के बाद 180 mg/dl के बीच होता है।
एक और कॉलेज स्टूडेंट देव सिंहने कहा कि टाइप-1 डायबिटीज आमतौर पर बच्चों या युवाओं में होती है क्योंकि उनका इम्यून सिस्टम पैंक्रियास के इंसुलिन बनानेवाले सेल्स को खत्म कर देता है, जिसके कारण शरीर इंसुलिन नहीं बना पाता और उन्हें जिंदगी भर इंसुलिन इंजेक्शन की जरूरत पड़ती है।
आज हर परिवार या व्यक्ति का लाइफस्टाइल मॉडर्न होता जा रहा है, जिसकी वजह से डायबिटीज के मरीजों की संख्या बढ़ रही है। इसके पीछे जंक फूड और फिजिकल एक्सरसाइज की कमी को सबसे बड़ा कारण माना जाता है। आज भी लोग ऐसी एक्सरसाइज करने से दूर रहते हैं जिनसे शरीर की एक्सरसाइज हो। सुस्त लाइफ भी इस बीमारी को न्योता देने जैसा है। फिजिकली हेल्दी रहने के लिए लोगों को अपनी डेली रूटीन में एक्सरसाइज और फिजिकल मेहनत को शामिल करना चाहिए, और साथ ही जंक फूड को हमेशा के लिए छोड़कर डायबिटीज की शाही बीमारी से बचा जा सकता है। हर हेल्दी व्यक्ति दिन में 40 मिनट पैदल चलने जैसी आसान एक्सरसाइज करके और ज्यादा शुगरवाली खाने की चीजों से बचकर डायबिटीज जैसी बीमारी को दूर रख सकता है। डायबिटीज नाम की शाही बीमारी किसी भी व्यक्ति की फिजिकल और मेंटल लाइफ को बहुत नुकसान पहुंचाती है। डायबिटीज दिमाग, दिल, किडनी और नसों पर बहुत गंभीर असर डालती है, जो शरीर के बहुत जरूरी अंग माने जाते हैं। इसलिए इस मॉडर्न युग में डेली रूटीन, खाने के प्रकार और फिजिकल मेहनत की बढ़ती पसंद के साथ आज डायबिटीज को कंट्रोल करना खास तौर पर जरूरी है।
इस सेमिनार में पोस्टर प्रेजेंटेशन,क्विज कॉम्पिटिशन और इलोक्युशन कॉम्पिटिशन जैसी कॉम्पिटिटिव एक्टिविटीज भी ऑर्गनाइज की गईं, जिसमें पोस्टर प्रेजेंटेशन में प्रथम क्रमांक रावल शीतलबेन, दूसरा क्रमांक मोमिन सकीनाफात्मा एस. और तीसरा क्रमांक राजपूत जिनल सुनील को मिला। क्विज कॉम्पिटिशन में पहला क्रमांक कुर्मी विपुलरंजन एस., दूसरा क्रमांक लोखर जेतिन जी और तीसरा क्रमांक सिंह देव आशीष को मिला, जबकि इलोक्युशन कॉम्पिटिशन में प्रथम क्रमांक  सिंह अभिनव आर.,दूसरा क्रमांक चौहान नीलेशभाई के. और तीसरा क्रमांक पटेल हेतवी आर. को मिला। इन तीनों विजेताओं को उपस्थित महानुभावने प्रमाण पत्र दिए। प्रोग्राम का अंत राष्ट्रगान के साथ हुआ।


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