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जेल जाने पर भरण पोषण का हक देना ही होगा:हाईकोर्ट ने कहा-मासिक भुगतान की पति की ज़िम्मेदारी खत्म नहीं होती

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक निर्णय में कहा कि किसी व्यक्ति को उसकी पत्नी या बच्चों को भरण-पोषण न देने के कारण सिविल जेल भेजने से उसकी आगे का मासिक भरण-पोषण का बकाया चुकाने की कानूनी ज़िम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि की बेंच ने साफ किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 300 के तहत ‘डबल जिओपार्डी’ (दोहरी सज़ा) का सिद्धांत, ‘घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005’ के तहत भरण-पोषण के आदेशों को लागू करने के मामले में बिल्कुल भी लागू नहीं होता। न दोषी न ही न बरी कोर्ट ने आगे कहा कि भरण-पोषण से जुड़ी कार्यवाही में न तो किसी को दोषी ठहराया जाता है और न ही बरी किया जाता है। इसलिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 300 के तहत किसी दलील का हवाला देकर भरण-पोषण की तय रकम को लागू करने से मना करना कानून के खिलाफ होगा। बेंच ने यह आदेश हसीना खातून की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। हसीना खातून ने मुरादाबाद में सिविल जज (जूनियर डिवीजन )/ फास्ट ट्रैक कोर्ट (महिलाओं के खिलाफ अपराध) द्वारा जनवरी 2023 में दिए गए एक आदेश को चुनौती दी थी। असल में जुलाई, 2019 में एक मजिस्ट्रेट ने याचिकाकर्ता के पति को आदेश दिया कि वह अपनी पत्नी को 4,000 रुपये और अपने दिव्यांग बेटे को 4,000 रुपये का अंतरिम भरण-पोषण दे। हालांकि, पति 2,64,000 रुपये का बकाया चुकाने में नाकाम रहा, जिसके बाद याचिकाकर्ता-पत्नी ने बकाया वसूली के लिए एक अर्जी दायर की। उसकी अर्जी पर बकाया वसूली का वारंट जारी किया गया और पति को 30 अक्टूबर, 2022 को गिरफ्तार किया गया। चूंकि उसने ट्रायल कोर्ट द्वारा तय की गई भरण-पोषण की रकम जमा करने से मना किया, इसलिए न्यायिक मजिस्ट्रेट ने उसे 30 दिनों के लिए सिविल जेल भेज दिया। भरण-पोषण में नाकाम रहा जेल से रिहा होने के बाद भी वह याचिकाकर्ता को भरण-पोषण की रकम चुकाने में नाकाम रहा। नतीजतन, याचिकाकर्ता ने एक और अर्जी दायर करके बकाया वसूली का नया वारंट जारी करने की मांग की। हालांकि, इस बार 2,64,000 रुपये की वसूली के लिए दायर उसकी अर्जी को इस आधार पर खारिज किया गया कि उसके पति ने पहले ही उस बकाया रकम के बदले 30 दिनों की जेल की सज़ा काट ली थी। सिविल जज (जूनियर डिवीजन )/फास्ट ट्रैक कोर्ट (महिलाओं के खिलाफ अपराध) ने अपने फैसले में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 300 का हवाला दिया। दूसरी ओर, पति ने उस आदेश का बचाव करते हुए जिसे चुनौती दी गई, यह तर्क दिया कि चूंकि उसने सज़ा के तौर पर तीस दिन की जेल काट ली है, इसलिए अब कोई बकाया नहीं बचा। पति ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत इस अर्जी की स्वीकार्यता को भी इस आधार पर चुनौती दी कि जिस आदेश को चुनौती दी गई, उसके खिलाफ घरेलू हिंसा एक्ट की धारा 29 के तहत अपील की जा सकती है। अपने 42- पृष्ठों के आदेश में पत्नी की अर्जी पर सुनवाई कर रही बेंच ने यह टिप्पणी की कि की धारा 300, घरेलू हिंसा एक्ट के तहत होने वाली कार्यवाही पर लागू नहीं होती, क्योंकि इस कार्यवाही का नतीजा न तो दोषसिद्धि होता है और न ही दोषमुक्ति । कोर्ट ने आगे कहा कि किसी दोषी को केवल सिविल जेल भेजने भर से पीड़ित पत्नी को मासिक भरण-पोषण की राशि देने की उसकी ज़िम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने आदेश रद्द कर दिया, जिसे चुनौती दी गई और संबंधित निचली अदालत को निर्देश दिया कि वह बकाया राशि की वसूली के लिए एक नया आदेश जारी करे; इस बकाया राशि में 6% की साधारण बैंक ब्याज दर भी शामिल होगी। बेंच ने अपने आदेश में आगे कहा, “इससे मिलने वाली रकम को प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट, मुरादाबाद, या ज़िला जज, मुरादाबाद, या ज़िला मुरादाबाद के किसी अन्य संबंधित सिविल जज/मजिस्ट्रेट के कोर्ट के खाते में रखा जाएगा, जिसका इस्तेमाल बकाया रकम के भुगतान के लिए किया जाएगा। इस बकाया रकम पर देरी से भुगतान के लिए 6% की दर से साधारण बैंक ब्याज भी लगेगा। पति आवेदक पत्नी और उसके दिव्यांग बेटे को मौजूदा मासिक भरण-पोषण की रकम नियमित रूप से देता रहेगा। उसके बाद कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।”

Source: Dainik Bhaskar via DNI News (Prayagraj)

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