रस्टिन डॉड | हम सभी अपनी जिंदगी की कहानी के नायक हैं। अक्सर हमें लगता है कि सफलता पाने के लिए हमें ‘सुपरमैन’ बनना होगा, सारे मुश्किल काम खुद करने होंगे और जीत का पूरा श्रेय भी हमें ही मिलना चाहिए। लेकिन मनोविज्ञान और खेल जगत के उदाहरण बताते हैं कि यही ‘हीरो सिंड्रोम’ हमारी असफलता का सबसे बड़ा कारण बन सकता है। अमेरिकी फुटबॉल लीग एनएफएल के क्वार्टरबैक सैम डार्नोल्ड की कहानी इस बात का जीवंत उदाहरण है। 2018 में जब उनका करियर शुरू हुआ, तो उनसे भारी उम्मीदें थीं, लेकिन वे दबाव में बिखर गए और असफलता के दौर से गुजरे। बदलाव तब आया जब 2023 में सैन फ्रांसिस्को 49ers के स्टार खिलाड़ी ब्रॉक पर्डी ने उन्हें एक सलाह दी; ‘सुपरमैन मत बनो, बास्केटबॉल के ‘पॉइंट गार्ड’ की तरह सोचो।’ बास्केटबॉल में पॉइंट गार्ड का काम हर बार खुद गोल करना नहीं होता, बल्कि गेंद को उस खिलाड़ी (प्लेमेकर) तक पहुंचाना होता है जो गोल करने की सबसे अच्छी स्थिति में हो। डार्नोल्ड ने जब यह समझा कि उनका काम सिर्फ गेंद को सही हाथों में सौंपना है और बाकी जादू साथियों को करने देना है, तो उनका खेल आसान हो गया। इस मानसिकता ने उन्हें 14 मैच जीतने और टीम को फाइनल की रेस में लाने में मदद की। यह केवल एक खेल की रणनीति नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक सत्य है। 1980 के दशक में मनोवैज्ञानिक जॉन स्वेलर ने कॉग्निटिव लोड थ्योरी में बताया कि जब हम ‘हीरो’ बनकर सारा बोझ खुद उठाने की कोशिश करते हैं, तो हमारे दिमाग पर ‘कॉग्निटिव लोड’ (बोझ) बढ़ जाता है। इससे थकान होती है और गलतियों की संभावना बढ़ जाती है। वहीं, जब हम दूसरों को सफल बनाने पर फोकस करते हैं, तो हमारा तनाव कम होता है और हम बेहतर निर्णय ले पाते हैं। महान बास्केटबॉल खिलाड़ी माइकल जॉर्डन भी शुरुआत में अकेले ही सारे पॉइंट्स बनाना चाहते थे। वे व्यक्तिगत रूप से महान थे, लेकिन उनकी टीम नहीं जीत रही थी। जब उनके कोच फिल जैक्सन ने उन्हें ‘निस्वार्थ जागरूकता’ सिखाई और उन्होंने साथियों पर भरोसा करना शुरू किया, तभी उनकी टीम चैम्पियन बन पाई। यह मंत्र ऑफिस और घर, दोनों जगह लागू होता है। जब हम यह सोचना बंद कर देते हैं कि ‘सब कुछ मुझे ही करना है’ और इस पर ध्यान देते हैं कि ‘मैं दूसरों की मदद कैसे कर सकता हूं’, तो हमारा प्रदर्शन अपने आप सुधर जाता है। यह जीत का सबसे बड़ा सूत्र है।
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