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गैर मजरुआ जमीनों को जिओ टैग कर बनेगा लैंड बैंक, हटेगा अब अवैध कब्जा

सिटी रिपोर्टर | शेखपुरा सरकार के निर्देश पर गैर मजरुआ जमीन को जियो-टैग कर लैंड बैंक बनाने को लेकर जिला प्रशासन की टीम जुट गई है। इन सरकारी या सार्वजनिक उपयोग की जमीनों की सटीक लोकेशन को डिजिटल मैप पर दर्ज होंगी ताकि उनकी सटीक पहचान हो सके और विवादों से बचते हुए इनका बेहतर प्रबंधन, विकास या आवंटन किया जा सके। खासकर गैर मजरुआ खास (व्यक्तिगत उपयोग वाली) और आम (सार्वजनिक) जमीनों के लिए। इस प्रक्रिया से पारदर्शिता बढ़ेगी और अतिक्रमण रोकने में मदद मिलेगी। जिससे भविष्य में इन जमीनों का उपयोग लैंड बैंक के रूप में हो सके। गौरतलब हो कि गैर मजरुआ जमीन वह जमीन होती है जो किसी व्यक्ति के नाम पर नहीं होती, बल्कि सरकार या सार्वजनिक उपयोग जैसे रास्ते, तालाब, जिस पर कोई कब्जा नहीं कर सकता और न ही इसकी रजिस्ट्री होती है। जबकि गैर मजरुआ खास, सरकारी स्वामित्व वाली जमीन होती है, जो कभी-कभी रैयतों (किसानों) को खेती या मकान के लिए आवंटित की जाती है, लेकिन इसका मालिकाना हक सरकार के पास रहता है, और इसकी खरीद-बिक्री पर अक्सर रोक होती है। इन जियो-टैग की गई जमीनों को एक डेटाबेस (लैंड बैंक) में रखा जाएगा। इनका उपयोग भविष्य में सरकारी परियोजनाओं, गरीबों के आवास, या अन्य जनहित के कार्यों के लिए किया जा सकता है, जिससे भूमि का सही और व्यवस्थित उपयोग सुनिश्चित हो सके। एडीएम लखिन्द्र पासवान ने बताया कि जिले मे 11665 एकड़ गैर मजरुआ आम जमीन है। जिसमे पोखर, सड़क, नहर इत्यादि है। इसमें बहुत सी परती भूमि है। इसकी जांच कराई जा रही है। जबकि गैर मजरूआ खास और मलिक जमीन 4634 एकड़ है। इसमें बहुत सी जमीन ऐसी है,जिसे किसी विभाग को बंदोबस्त किया गया है या भूमिहीनों का आवंटित किया गया है। बाकी खाली रकबा को चिन्हित किया जा रहा है। अगर गैर मजरुआ जमीन अतिक्रमित है तो अतिक्रमण को हटाया जाएगा। ऐसे सभी गैर मजरुआ आम व खास जमीन का आंकड़ा जिओ टैग के साथ ऑनलाइन अपडेट किया जायेगा। जरूरत पड़ने पर किसी भी प्रोजेक्ट के लिए यहीं से जमीन तुरंत देने में आसानी होगी। यह कार्य जियो टैग, फोटोग्राफ के साथ किया जा रहा है। ताकि एक क्लिक में ही पता चल सकेगा यह जमीन कहां है। ऐसे जमीन को विभागीय नेट पर भी डाला जाएगा ताकि कोई गलत तरीके से गैर मजरुआ जमीन को बिक्री न कर सके और जमीन की टैगिंग देख ही लोगों को भी पता चले की यह जमीन सरकारी है। गैर मजरुआ जमीन को मिलेगी पहचान जमीन ब्रोकर द्वारा तालाब या सरकारी जमीन को अंधेरे में रखकर ऊंची कीमत पर इच्छुक व्यक्ति को बेच देते है। वर्षों बाद सीओ द्वारा खरीद किया गया जमीन सरकारी भूमि होने का नोटिस मिलने के बाद धोखाधड़ी की जानकारी मिलती है और जमीन मालिक अपनी खून पसीने से गाढ़ी कमाई दलाल के हाथों लुटा देते हैं और फिर कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाने को विवश हो जाते है। इसी सब जालसाजी से बचाने को लेकर सरकार के निर्देश पर सरकारी जमीन को चिन्हित कर सार्वजिक करने की योजना बनाई गई है। जिससे आमलोगों को जालसाजी से बचाया जा सके और विवादित खरीद बिक्री पर रोक लगा सकें।


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