गाजीपुर में 6 साल की बच्ची से दुष्कर्म के मामले में मेडिकल जांच में 15 घंटे की देरी को लेकर स्वास्थ्य विभाग में विवाद गहरा गया है। मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) और मेडिकल कॉलेज प्रशासन के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। मुख्य चिकित्सा अधिकारी सुनील पाण्डेय ने महर्षि विश्वामित्र स्वशासी राजकीय मेडिकल कॉलेज प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगाया। उनका कहना था कि मेडिकल कॉलेज की वजह से पीड़िता को समय पर मेडिकल सुविधा नहीं मिल सकी। मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. आनंद मिश्रा ने सीएमओ के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि देरी के लिए मेडिकल कॉलेज नहीं, बल्कि गोराबाजार ट्रॉमा सेंटर जिम्मेदार है। डॉ. मिश्रा ने ड्यूटी चार्ट दिखाते हुए बताया कि ट्रॉमा सेंटर में ड्यूटी पर डॉक्टर मौजूद नहीं थे, जिसके कारण मेडिकल जांच नहीं हो सकी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मेडिको-लीगल जांच के बिना इलाज शुरू करना कानूनी रूप से गलत है और इससे सबूतों से छेड़छाड़ मानी जाती है। दो डॉक्टरों की गैरमौजूदगी का दावा प्रिंसिपल के अनुसार, ट्रॉमा सेंटर में तैनात दो डॉक्टर—डॉ. मनोरमा यादव और डॉ. पल्लवी राय—ड्यूटी पर मौजूद नहीं थीं, जिससे जांच में देरी हुई। उन्होंने बताया कि घटना सुबह करीब 10 बजे की थी, जबकि मेडिकल जांच करीब 15 घंटे बाद कराई जा सकी। सीएमओ ने इससे पहले ऐसी 6 घटनाएं होने का दावा किया था, जिसे प्रिंसिपल ने गलत बताते हुए इसे संस्थान की छवि खराब करने की कोशिश बताया।

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