गाजीपुर में गंगा नदी के बीच उभरे बालू के टापू भूमिहीन किसानों के लिए आजीविका का प्रमुख साधन बन गए हैं। जिन किसानों के पास अपनी या किराए की जमीन नहीं है, वे इन रेतीले टापुओं पर सब्जियां उगाकर अपनी रोजी-रोटी चला रहे हैं। पूरा परिवार नाव से इन टापुओं तक पहुँचता है और दिन भर खेती के काम में जुटा रहता है। गर्मी का मौसम शुरू होते ही गंगा का जलस्तर घटने लगता है, जिससे नदी के बीच में बालू के टापू उभर आते हैं। ददरी घाट और आसपास के क्षेत्रों में किसान इन टापुओं को खेतों में बदल देते हैं। इन रेतीले खेतों पर ककड़ी, खीरा, तरबूज, नाशपाती, लौकी, भिंडी, करेला, नेनुआ और प्याज जैसी फसलें उगाई जाती हैं। किसान सिंचाई के लिए गंगा के पानी का उपयोग करते हैं और गोबर की खाद व अन्य पोषक तत्वों से फसलों को तैयार करते हैं। वे कीटनाशकों का छिड़काव कर फसलों को कीटों से भी बचाते हैं। यह पूरी प्रक्रिया प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित होती है। किसानों की मेहनत अब रंग ला रही है। फसलें बाजारों तक पहुँच रही हैं, जहाँ ककड़ी जैसी उपज 5 से 7 रुपये प्रति पीस के हिसाब से बिक रही है। इससे किसानों को प्रति सैकड़ा 500 से 700 रुपये तक की आय हो रही है। स्थानीय मंडियों के साथ-साथ बाहरी व्यापारी भी सीधे किसानों से खरीदारी करने पहुँच रहे हैं। किसानों को उम्मीद है कि इस बार उनकी लागत निकलने के साथ-साथ अच्छा मुनाफा भी होगा। गंगा की रेत पर उगाई गई ये फसलें उनके जीवन में आर्थिक स्थिरता लाने में सहायक सिद्ध हो रही हैं।

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