मेरठ में एक साथ कई लोगों को साइबर अपराधियों ने अपना शिकार बनाने का प्रयास किया। इसमें खास बात यह रही कि सभी पर एक ही फार्मूला एप्लाई हुआ। एक स्पेशल कोड डायल कराकर फोन हैक कर लिया और फिर परिचितों से मदद के नाम पर रकम मांगी गई। गनीमत रही कि उससे पहले ही राजफाश हो गया। पूरे मामले में कॉमन बात यह थी कि जितने लोग इस फेहरिस्त में थे, वह सभी किसी ना किसी स्कूल के प्रधानाचार्य थे। साइबर थाना पुलिस अब मामले की छानबीन कर रही है…! पहले एक नजर पूरे मामले पर
साइबर अपराधियों ने शहर में एक साथ कई स्कूलों के प्रधानाचार्य को ठगने की कोशिश की। इनमें एसडी सदर स्कूल के प्रधानाचार्य अरुण कुमार गर्ग, इस्माईल नेशनल कन्या इंटर कॉलेज शास्त्रीनगर की प्रधानाचार्या डा.मृदुला शर्मा कुल आठ प्रधानाचार्य शामिल रहे। दो दिन तक यह क्रम चला। गनीमत रही कि सभी बाल बाल बच गए। अपराध करने का तरीका एकदम अलग था। सभी के पहले फोन या कहें तो व्हाट्सअप नंबर हैक किए गए और फिर उनके परिचितों से मदद के नाम पर रकम मांगी गई। केस-1 : जागृति विहार निवासी डा. मृदुला शर्मा शास्त्रीनगर स्थित इस्माईल नेशनल कन्या इंटर कॉलेज में प्रधानाचार्या हैं। रविवार सुबह जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय से विद्यालय की लैब के लिए कुछ सामान भेजा गया जो डा. मृदुला शर्मा ने रिसीव करा लिया। कुछ देर बाद ही करीब 11 बजकर 24 मिनट पर फिर एक फोन उनके पास आया। कॉलर बोला- मैडम, आपका पार्सल रिसीव कर लीजिए। डा. मृदुला ने आनाकानी की तो कॉलर ने एक नंबर नोट कराया। इस नंबर को डायल करते ही डा. मृदुला शर्मा का फोन हैक हो गया। केस-2 : लालकुर्ती तोपखाना निवासी अरुण कुमार गर्ग एसडी सदर स्कूल के प्रधानाचार्य हैं। दो दिन पहले उनके मोबाइल पर फोन आया। कॉलर ने कहा कि आपके स्कूल में परीक्षा से जुड़ा एक कुरियर आ रहा है लेकिन कुरियर ब्वाय को लोकेशन नहीं मिल रही। अरुण कुमार ने सीधे स्वभाव कुरियर ब्वाय का नंबर ले लिया और उसे डायल कर दिया। डायल करते ही उनका फोन भी हैक हो गया लेकिन उन्हें पता नहीं चला। इसके बाद अरुण कुमार गर्ग के फोन से भी मैसेज जाने शुरु हो गए। नंबर डायल करते ही फोन हैक डा. मृदुला शर्मा ने बताया कि उनके फोन कट करने के कुछ देर बाद फिर फोन आया। इस बार कॉल उनके पति ने रिसीव किया और उस नंबर को डायल कर दिया जो हैकर द्वारा बताया गया। इसके बाद फोन कट गया। कुछ देर बाद ही उनके फोन से परिचितों को HELP ME के मैसेज आने शुरु हो गए। एक टीचर ने उनके बेटे के फोन पर कॉल कर पूछा कि सब ठीक है। मम्मी मदद क्यों मांग रही हैं। बेटे ने फोन चेक किया तो पता चला कि वह हैक है। आनन फानन में फोन रिस्टार्ट किया और स्टेटस पर मैसेज डाला कि फोन हैक हो गया है। अरुण कुमार गर्ग की कहानी भी मिलती जुलती है। उनका फोन हैक हो गया लेकिन 15 घंटे बाद भी उन्हें पता नहीं चल पाया। अगले दिन उन्होंने अपनी बेटी से एक कॉलर ट्यून लगाने के लिए कहा। बेटी ने कॉलर ट्यून सेट कर दी लेकिन फोन कॉल नहीं मिल पा रही थी। चेक किया तो पता चला कि कॉल किसी अन्य नंबर पर फार्वर्ड हो रही हैं। इसके बाद अरुण कुमार गर्ग ने साइबर थाने में तैनात अपने परिचित साइबर एक्सपर्ट को फोन कर मदद मांगी और बच गए। कॉल फॉरवर्ड के लिए डलवाया कोड
इस पूरे घटनाक्रम में एक ही बात खास थी। साइबर अपराधियों ने फोन हैक ना कर अपने नंबर पर कॉल फॉरवर्ड की। इसके लिए उन्होंने क्रमश: *21#9038540746 व *21*8981496295 जैसे नंबर डायल कराए। जानकारों की मानें तो कॉल फॉरवर्ड करने का भी एक मकसद होता है। दरअसल, दो तरीके से ओटीपी शेयर होते हैं। एक मैसेज और दूसरा कॉल से। साइबर ठग कॉल के जरिए ओटीपी जानते हैं और किसी को पता भी नहीं चल पाता। इस घटनाक्रम में कॉल व मैसेज दोनों का उपयोग हुआ। ठगों के पास कहां से आए नंबर
पूरी वारदात में सबसे चौकाने वाली बात यह थी कि निशाना इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्यों को बनाया गया था। साइबर ठग के पास पूरी जानकारी थी कि 5 अप्रैल को प्रतियोगी परीक्षा प्रस्तावित है और मेरठ में सेंटर बने हैं। इसलिए उन्होंने इन स्कूलों के प्रधानाचार्यों को टार्गेट किया। वह यह तक जानते थे कि प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए सामग्री जाती है। सवाल यह है कि इतनी सटीक जानकारी का साइबर ठगों के पास स्रोत क्या था? कहां से केंद्र व्यवस्थापकों के उनको नंबर मिल गए। अभी तक इन कोड का होता था प्रयोग साइबर एक्सपर्ट आर्या त्यागी बताते हैं कि अभी तक कॉल फारवर्ड या कॉल डाइवर्ट करने के लिए **21* (नंबर)# का उपयोग किया जाता था। साइबर ठगों ने *21* (नंबर) और *21# (नंबर) का प्रयोग किया है। अगर किसी ने यह नंबर डायल किया है तो वह तत्काल अपने नंबर से ##21# या ##002# डायल करे। तब ही कॉल फारवर्डिंग बंद होगी।

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