केंद्रीय विद्युत मंत्रालय की ताजा रेटिंग में दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम का स्कोर 11.23 से बढ़कर 45.04 हो गया। रेटिंग ‘C-’ से सुधरकर ‘B-’ पहुंच गई। वितरण हानियां घटकर 15.53% रह गईं, जो राष्ट्रीय औसत के करीब है। कलेक्शन एफिशिएंसी 95% तक पहुंच गई। पूर्वांचल का स्कोर भी 18.76 से बढ़कर 29.38 हो गया। रेटिंग ‘C-’ से ‘C’ हुई। वितरण हानियां घटकर 15.96% रह गईं। दक्षिणांचल में औसत राजस्व वसूली और बिजली बिक्री दर का अंतर सिर्फ 16 पैसे प्रति यूनिट रह गया। जबकि पूर्वांचल में यह 59 पैसे तक सीमित हो गया। ताजा रेटिंग का हवाला देते हुए बिजली कर्मचारी यूनियनों ने दोनों कंपनियों के निजीकरण का फैसला वापस लेने की मांग तेज कर दी है। पूर्वांचल-दक्षिणांचल में यूपी के सबसे गरीब परिवार रहते हैं विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, के संयोजक शैलेंद्र दुबे ने कहा कि जब निगमों की कार्यक्षमता लगातार बेहतर हो रही है, तो घाटे का बहाना बनाकर इनको निजी हाथों में सौंपने का क्या मतलब? संघर्ष समिति के केंद्रीय पदाधिकारियों ने बताया कि प्रदेश के सबसे पिछड़े और गरीब 42 जनपद इन दोनों निगमों के अंतर्गत आते हैं। पूर्वांचल में सबसे ज्यादा गरीबी है। वहीं, दक्षिणांचल में बुंदेलखंड जैसे इलाके शामिल हैं, जहां भयंकर विषमताएं हैं। कई जगह पानी की जमीन इतनी गहरी है कि बिजली पहुंचाना खुद में बड़ी चुनौती है। ऐसे में ग्रेटर नोएडा या शहरी-औद्योगिक क्षेत्रों से इनकी तुलना करना गलत है। संघर्ष समिति ने आरोप लगाया कि पावर कॉर्पोरेशन प्रबंधन अब तक गलत और बढ़ा-चढ़ाकर आंकड़े पेश करके घाटे का रोना रो रहा था। इसी आधार पर निजीकरण का फैसला लिया गया था। सीएम योगी से हस्तक्षेप की मांग समिति ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व पर भरोसा व्यक्त करते हुए कहा कि अब उन्हें इस मामले में हस्तक्षेप करके निजीकरण की प्रक्रिया पर रोक लगा देनी चाहिए। पिछजे 482 दिनों से आंदोलनरत होने के बावजूद कर्मचारियों ने उपभोक्ता सेवा को कभी नहीं छोड़ा। प्रयागराज महाकुंभ के दौरान पूर्वांचल के बिजली कर्मचारियों ने जो उत्कृष्ट काम किया, उसने न सिर्फ प्रदेश बल्कि पूरे देश की प्रतिष्ठा बढ़ाई।

Leave a Reply