कुशीनगर जिले में आस्था के महापर्व छठ पूजा पर बांस के सूप और दउरा की मांग घट गई है। आधुनिकता के कारण लोग अब पीतल, अन्य धातुओं और प्लास्टिक के उत्पादों का उपयोग कर रहे हैं, जिससे बांसफोड़ समाज के कारीगरों की आजीविका प्रभावित हो रही है। पारंपरिक रूप से छठ पूजा में बांस से बने सूप, दउरा और डगरा का विशेष महत्व रहा है। वाल्मीकि (बांसफोड़) समाज पीढ़ियों से इन वस्तुओं का निर्माण करता आ रहा है, लेकिन अब प्लास्टिक और धातु के उत्पादों के बढ़ते चलन ने उनकी बिक्री कम कर दी है। मोहन वाल्मीकि, जो पुश्तों से इस व्यवसाय में हैं, बताते हैं कि प्लास्टिक की वस्तुओं ने उनकी मांग कम कर दी है। उन्हें सरकार से न तो जमीन मिली है और न ही कोई सुविधा। बांस की बढ़ती कीमतें भी एक समस्या है, जिससे लागत निकालना मुश्किल हो गया है। बांसफोड़ समाज के हरेंद्र ने बताया कि उनके पास खेती की जमीन नहीं है और यही काम उनका एकमात्र सहारा है। उन्होंने शिकायत की कि बांस व्यापारी बाहर ले जा रहे हैं, जिससे उन्हें कच्चा माल नहीं मिल पा रहा है। सरकार से कोई भत्ता या सहयोग भी नहीं मिलता। कई परिवारों के 10 से 12 सदस्य अभी भी इस पुश्तैनी काम में लगे हुए हैं, दिन-रात दउरा और सूप बनाने में पसीना बहा रहे हैं। हालांकि, अब इस रोजगार में लागत अधिक और मुनाफा कम हो गया है, जिससे उनकी रोजी-रोटी चलाना मुश्किल हो गया है। चमेली देवी बताती हैं कि महंगाई का दौर है. बांस पहले 50 से 60 रुपये प्रति पीस मिल जाता था. लेकिन,अब 200 से 250 रुपये पीस बड़ी मुश्किल से हो रहा है. बड़ी गाड़ियों में भरकर बांस को शहर भेजा जा रहा है. उनके उत्पादों की कीमत पहले जैसा ही है. 100 रुपये पीस डगरा, 30 से 60 रुपये सूप व बड़ा दउरा 250 से 300 बिक रहा है। गाँव के पुराने लोग कहते है कि लोक आस्था का महापर्व छठ शुद्धता और स्वच्छता के लिए भी जाना जाता है. भले ही आधुनिकता के इस दौर में प्लास्टिक और तांबा व पीतल के बने सूप भी बाजार में उपलब्ध हैं. लेकिन महापर्व में शुद्धता के लिए आज भी बांस के बने सूप और दउरा ही हैं और छठ व्रतियों की पहली पसंद भी थी. आज भी ग्रामीण इलाकों की महिलाये का कहना है कि बांस के उत्पाद के बिना डाला अधूरा है।
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