Breaking NewsPrayagraj NewsUP News

काशी में आज से 103वें संगीत समारोह का होगा आयोजन:पहले दिन पद्मश्री मालिनी अवस्थी की प्रस्तुति,6 दिन में आयेंगे 135 कलाकार


                 काशी में आज से 103वें संगीत समारोह का होगा आयोजन:पहले दिन पद्मश्री मालिनी अवस्थी की प्रस्तुति,6 दिन में आयेंगे 135 कलाकार

काशी में आज से 103वें संगीत समारोह का होगा आयोजन:पहले दिन पद्मश्री मालिनी अवस्थी की प्रस्तुति,6 दिन में आयेंगे 135 कलाकार

संकटमोचन संगीत समारोह के 103वें संस्करण का आज से आगाज हो रहा है पहले दिन पद्मश्री मालिनी अवस्थी के गीतों से पवन पुत्र हनुमान का आंगन गूंजेगा। इस बार संगीत समारोह में नए कलाकारों को सबसे अधिक मौका दिया गया है। छह निशाओं तक लगातार होने वाले इस आयोजन में इस वर्ष कुल 45 प्रस्तुतियां होंगी। इनमें 12 पद्म अवार्डी, 21 नव प्रवेशी और शेष 12 ऐसे कलाकार हैं जो कई वर्षों से बजरंगबली के दरबार में हाजिरी लगा रहे हैं। करीब 150 कलाकारों में 12 मुस्लिम भी शामिल किए गए हैं। 11 अप्रैल तक चलेगा कार्यक्रम संकटमोचन मंदिर के महंत प्रो.विश्वम्भरनाथ मिश्र ने बताया कि 45 कलाकारों में बनारस घराने के कुछ कलाकारों को भी अवसर दिया गया है। यही नहीं मुख्य कलाकारों के साथ अधिकतर संगतकार बनारस घराने के ही हैं। छह से 11 अप्रैल तक होने वाले संगीत समारोह में प्रस्तुतियों का क्रम प्रत्येक संध्या साढ़े सात बजे से आरंभ होगा। संगीत समारोह की शुरुआत काशी की नाट्य संस्था रूपवाणी के रंगधर्मियों द्वारा नृत्य नाटिका के मंचन से होगा। इसका समापन पद्मभूषण पं.साजन मिश्र की स्वरांजलि से होगा। सार्वभौम रामायण सम्मेलन की शुरुआत संकटमोचन मंदिर में सार्वभौम रामायण सम्मेलन की शुरुआत वर्ष 1922 में हुई। तीन दिन सार्वभौम रामायण सम्मेलन का समापन चौथे दिन संगीत समारोह से होता था। गर्भगृह के ठीक बाहर कलाकार गायन-वादन करते थे। यह क्रम अगले 25 वर्षों तक चला. रामायण समारोह का पूरा दायित्व तत्कालीन बड़े महंत पं. बांकेराम मिश्र निभाते तो एक दिवसीय संगीत समारोह की कमान तत्कालीन छोटे महंत पं. अमरनाथ मिश्र के हाथों में होती। संगीत समारोह में श्रोताओं की बढ़ती भीड़ को देखते हुए वर्ष 1948 में तत्कालीन बड़े महंत पं. बांकेराम मिश्र के निर्देश पर मंदिर परिसर स्थित कुएं की जगत मंच के रूप में इस्तेमाल की जाने लगी। साल दर साल आयोजन की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से चढ़ने लगा. काशी के कबीरचौरा और रामापुरा मोहल्ले के कलाकारों का जुड़ाव आयोजन से तेजी से बढ़ा। छोटे महंत पं. अमरनाथ मिश्र, जो स्वयं एक सिद्ध पखावज वादक थे और तबला वादक पं. किशन महाराज की घनिष्ठ मित्रता ने इस आयोजन के स्वरूप को और भी विस्तार दिया। नौ साल बाद महिलाओं को मिला था प्रवेश गायन में महिलाओं के प्रवेश के नौ साल बाद 1987 में नृत्य में भी अवसर मिला। पहली नृत्यांगना के रूप में संयुक्ता पाणिग्रहि ने ओडिसी की प्रस्तुति की। उसके बाद उमा शर्मा और सोनल मानसिंह का आना हुआ। इस बीच हुआ यह कि सबसे यशस्वी तबला वादक किशन महाराज ने इस आयोजन से दूरी बना ली। 1979 से 1993 तक किशन महाराज नहीं आये. इस बीच पं. शारदा सहाय, पं. शामता प्रसाद, पं. लच्छू महाराज, पं. ईश्वर लाल मिश्र और पं. छोटे लाल मिश्र जैसे ख्यातिलब्ध तबला वादकों ने कोई कमी महसूस नहीं होने दी। 1983 में वर्तमान महंत प्रो. मिश्र इलेक्ट्रानिक्स इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन के लिए मैसूर चले गए। आज के संगीत समारोह में शामिल होने वाले कलाकार रूपवाणी संस्था की नृत्य नाटिका, पं.राहुल शर्मा का संतूर वादन, विधालाल का कथक, एस.आकाश-यद्नेश रायकर की बांसुरी-वायलिन जुगलबंदी, मालिनी अवस्थी का उपशास्त्रीय गायन, राहुल मिश्रा का एकल तबला वादन, पं.हरविंदर शर्मा का सितार वादन और शिखा भट्टाचार्या का कथक नृत्य।


Source: Dainik Bhaskar via DNI News

Puri Khabar Yahan Padhein

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *