अयोध्या में सुनवा गांव के पास आदि गंगा गोमती नदी तट पर घने जंगलों में विराजमान मां कामाख्या देवी मंदिर में भारी भक्तों की भीड़ देखने को मिली रही है। नवरात्र के चौथे दिन श्रद्धालुओं ने बड़ी श्रद्धा के साथ देवी मां का दर्शन और पूजन कर रहे है। जंगलों के बीच स्थित इस प्राचीन देवीस्थान के बारे में तमाम किन्वदंतियां हैं। देवी मां के चमत्कारों की कहानियां हैं। इसी कारणवश प्राचीन मंदिर पर भक्त श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जमा हो रही है। शहरी आबादी से काफी दूर निर्जन स्थान पर यह प्राचीन देवस्थान स्थित है। जंगलों के बीच मां कामाख्या भवानी का यह मंदिर क्षेत्रीय नहीं बल्कि अयोध्या के आस पास के जनपद अमेठी, सुल्तानपुर, गोंडा, बस्ती, बाराबंकी, बलरामपुर, अंबेडकरनगर सहित अन्य जनपदों के भक्तों के लिए भी आस्था का केंद्र बना है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, मां कामाख्या भवानी का इतना पुण्य प्रताप है कि जंगल में रहने वाले जीव जंतु भी उनके दर्शनों के लिए मंदिर में आते हैं। सिद्ध पीठ कामाख्या धाम का जिक्र दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय में वर्णित राजा सुरथ और वैश्य सुरभि का तपस्या स्थल भी है। जहां तपस्या के बाद माता जी ने प्रसन्न होकर दर्शन दिया था। तभी से यहां पर मां काली, माता सरस्वती और माता लक्ष्मी पिंडी के रूप में विराजमान हैं। मंदिर के पुजारी ने बताया कि भक्तों का सैलाब ही इस बात का प्रमाण है कि माता के दर्शन मात्र से ही मनोकामनाएं पूरी होती हैं। सुबह 4 बजे से ही माता के भक्त मंदिर पहुंचकर पूजा अर्चना करना शुरू कर देते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां पर आने वाले माता रानी के हर भक्त की मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है। इस माता रानी के स्थान पर अब धीरे-धीरे कायाकल्प भी होना शुरू हो गया है। पहले यहां पर लोगों के उठने बैठने की भी कोई सही व्यवस्था नहीं थी लेकिन स्थानीय लोगों और सरकार की पहल से अब लगातार यहां पर विकास हो रहा है।

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