इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के मेडिकल क्लेम से जुड़े नियमों पर एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है। कोर्ट ने कहा है कि यदि इलाज के दौरान लाभार्थी की मृत्यु हो जाती है या वह दावा करने की स्थिति में नहीं रहता, तो उसके कानूनी वारिस भी मेडिकल खर्च की प्रतिपूर्ति का दावा कर सकते हैं। यह आदेश न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की पीठ ने चंद्र चूड़ सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया। मामला एक सेवानिवृत्त डिप्टी रजिस्ट्रार के इलाज से संबंधित था, जिनका लखनऊ के एक प्राइवेट हॉस्पिटल में उपचार के दौरान निधन हो गया था। उनके पुत्र ने इलाज में हुए खर्च की प्रतिपूर्ति के लिए आवेदन किया था। नियम के हवाले को अस्वीकार किया विभाग ने इस दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि नियमों के तहत केवल “लाभार्थी” ही क्लेम कर सकता है। राज्य सरकार ने भी उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (चिकित्सा उपस्थिति) नियम, 2011 का हवाला दिया था। पीठ ने सरकार के इस तर्क को अस्वीकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि नियम-16 की ऐसी व्याख्या, जो वारिसों को अधिकार से वंचित करती है, मनमानी है और भारतीय संविधान के अनुच्छेद-14 का उल्लंघन करती है। पात्र लाभार्थी न होने पर वारिस की मौजूदगी पर्याप्त अदालत ने “रीडिंग डाउन” के सिद्धांत का उपयोग करते हुए स्पष्ट किया कि नियम-16 को इस तरह पढ़ा जाना चाहिए कि उसमें कानूनी वारिस भी शामिल हों, खासकर तब जब कोई अन्य पात्र लाभार्थी मौजूद न हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि वारिस को लेकर कोई विवाद नहीं है, तो तकनीकी कारणों से क्लेम खारिज करना उचित नहीं होगा। अदालत ने संबंधित प्राधिकरण को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता के दावे पर दो माह के भीतर दोबारा विचार कर निर्णय लिया जाए और यदि दावा सही पाया जाता है, तो एक माह के भीतर भुगतान किया जाए।

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