इटली के पूर्व पीएम मारियो द्रागी ने दावा किया है कि ग्लोबल ऑर्डर मर चुका है। बेल्जियम की ल्यूवेन यूनिवर्सिटी में सोमवार को आयोजित एक समारोह में उन्होंने कहा कि जो लोग ये चेतावनी दे रहे हैं कि मौजूदा ग्लोबल इकोनॉमिक ऑर्डर टूट रहा है, वे सही हैं। द्रागी यह भी कहा कि असली खतरा इसके टूटने से नहीं है, बल्कि इस बात से है कि इसकी जगह क्या लेगा। उन्होंने कहा कि यूरोप को एक ऐसे अमेरिका का सामना करना पड़ रहा है जो ये कहता है कि उसने बहुत ज्यादा कीमत चुकाई है, लेकिन ये नहीं देखता कि उसे कितने फायदे मिले हैं। वहीं चीन पर उन्होंने आरोप लगाया कि वो ग्लोबल सप्लाई चेन के अहम हिस्सों को अपने कंट्रोल में रखता है। इस ताकत का इस्तेमाल बाजारों में सस्ता माल डंप करने, जरूरी चीजों की सप्लाई रोकने और अपनी आर्थिक गड़बड़ियों का बोझ दूसरों पर डालने के लिए करता है। द्रागी बोले- यूरोप अंदर से बंट सकता है द्रागी ने चेतावनी दी कि ऐसे हालात में यूरोप को खतरा है कि वह कमजोर पड़ सकता है, अंदर से बंट सकता है और उसका इंडस्ट्री सिस्टम भी कमजोर हो सकता है। उन्होंने कहा कि यूरोपीय यूनियन (EU) को जल्द से जल्द अपनी व्यापार नीति में बदलाव करना चाहिए और जरूरी सप्लाई चेन में अपनी स्थिति मजबूत करनी चाहिए, क्योंकि देशों के बीच प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। द्रागी ने कहा कि बदलती ग्लोबल ताकतों के दौर में यूरोप को अब सिर्फ देशों के ढीले-ढाले समूह की तरह नहीं, बल्कि एक मजबूत यूनियन की तरह काम करना होगा। यूरोप की कमजोरियां उसकी ताकत पर हावी हो जाती हैं द्रागी ने कहा कि यूरोप ने जब व्यापार, बाजार, कॉम्पिटिशन और करेंसी जैसे मामलों में मिलकर काम किया है, वहां उसे एक मजबूत ताकत माना गया। लेकिन जहां डिफेंस, इंडस्ट्री और विदेश नीति में सब देश अलग-अलग चलते हैं, वहां यूरोप को छोटे-छोटे देशों का बिखरा हुआ समूह समझा जाता है, जिसे आसानी से अलग-अलग करके दबाया जा सकता है। उन्होंने यह भी समझाया कि जब व्यापार और सुरक्षा आपस में जुड़ जाते हैं, तो यूरोप की कमजोरियां उसकी ताकत पर हावी हो जाती हैं। द्रागी ने साफ कहा कि अगर यूरोप पैसे और व्यापार के मामले में तो एकजुट है, लेकिन सुरक्षा और सेना के मामले में बंटा हुआ है, तो उसकी आर्थिक ताकत का इस्तेमाल उसकी सुरक्षा की कमजोरी के खिलाफ किया जा सकता है, और आज यही हो रहा है। ग्रीनलैंड को अभी भी अमेरिका के कब्जे का डर ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की धमकियों का जिक्र करते हुए द्रागी ने कहा कि इससे ये साफ हो गया कि यूरोप कितनी क्षमता के साथ कार्रवाई कर सकता है। उन्होंने कहा कि सीधे खतरे के सामने दिया गया मजबूत जवाब लोगों पर ज्यादा असर डालता है, बजाय किसी सम्मेलन के औपचारिक बयान के। वहीं, ग्रीनलैंड प्रधानमंत्री जेन्स फ्रेडरिक-नील्सन ने चेतावनी दी है कि अमेरिका का ग्रीनलैंड को लेकर नजरिया नहीं बदला है। उनका कहना है कि अमेरिका अब भी ग्रीनलैंड पर कब्जा करना चाहता है। उन्होंने कहा कि इस सोच ने ग्रीनलैंड के लोगों के बीच डर और बेचैनी पैदा कर दी है। कई लोग ठीक से सो नहीं पा रहे हैं, बच्चों को भी बड़ों की चिंता और डर महसूस हो रहा है, और हर कोई इस बात को लेकर परेशान है कि आगे क्या हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि भले ही मामला सीधे ग्रीनलैंड से जुड़ा हो, लेकिन इसका असर नाटो के भविष्य, पश्चिमी देशों की सुरक्षा और पूरी दुनिया की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर पड़ता है। ट्रम्प की नीतियों से यूरोपीय देशों का भरोसा उठ रहा द गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रम्प के NATO पर सवाल उठाने, ग्रीनलैंड पर कब्जे की मांग और गठबंधन की अनदेखी रवैयै ने यूरोपीय सहयोगियों में विश्वास की कमी पैदा की है। इसमें सबसे बड़ा रोल ट्रम्प की टैरिफ धमकियों का है। यूरोप के टैक्स फाउंडेशन की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रम्प ने दुनियाभर के देशों पर औसतन 10 से 25% तक टैरिफ लगाया है। इससे व्यापार में अनिश्चितता का खतरा बढ़ गया है। यूरोपीय देशों पर लगे 15% टैरिफ का सीधे तौर पर फ्रांस और जर्मनी पर पड़ा है। टैरिफ ने इन देशों में वित्तीय संकट और आर्थिक मंदी की आशंका बढ़ा दी है। ट्रम्प ने इस महीने यूरोप के 8 देशों को 10% एक्स्ट्रा टैरिफ लगाने की धमकी दी थी। ये देश ग्रीनलैंड पर अमेरिकी कब्जे का विरोध कर रहे थे। हालांकि ट्रम्प ने बाद में अपना फैसला वापस ले लिया। मिलकर लड़ें तो बड़े देशों से लड़ा जा सकता है न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, देशों की सीमाएं और उनकी आजादी यूरोप की सोच की बुनियाद है। यह समझ दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनी, जब बड़ी ताकतों के जमीन हड़पने की जिद की वजह से लाखों लोग मारे गए। उस अनुभव से यूरोप ने सीखा कि छोटे देशों को बड़ी ताकतों से बचाने का सबसे अच्छा तरीका सब मिलकर एक-दूसरे की सीमाओं की रक्षा करना है। आज यूरोप को फिर से बड़ी ताकतों की बढ़ती जिद का सामना करना पड़ रहा है। रूस यूक्रेन पर कब्जा करने की कोशिश कर रहा है, जबकि पहले वह खुद यूक्रेन की आजादी को मान चुका है। दूसरी तरफ अमेरिका, डेनमार्क से ग्रीनलैंड अपने कब्जे में देने की बात कर रहा है, जबकि डेनमार्क यूरोप और नाटो का भरोसेमंद साथी देश है। यूरोप के लिए अपनी सीमाओं और अपनी आजादी की रक्षा सबसे अहम बात है। इस पर कोई समझौता नहीं हो सकता। यूरोपीय संघ और नाटो, दोनों ने यह बात साफ कर दी है। भले ही आज की दुनिया में अंतरराष्ट्रीय कानून, संयुक्त राष्ट्र के नियम या पुराने समझौते कमजोर पड़ते दिखें, लेकिन यूरोप के लिए इन्हीं नियमों पर टिके रहना जरूरी है। यही उसकी सोच है और यही उसका रास्ता भी। मारियो द्रागी को मीडिया सुपर मारियो कहती है मारियो द्रागी इटली के जाने-माने अर्थशास्त्री और नेता हैं, जिन्हें दुनिया भर में यूरोप की अर्थव्यवस्था को संभालने वाले शख्स के तौर पर जाना जाता है। जब यूरोप गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा था, तब द्रागी ने ऐसे फैसले लिए जिनसे हालात संभल सके। द्रागी को असली पहचान तब मिली जब वे 2011 में यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ECB) के अध्यक्ष बने। उस वक्त यूरोप कर्ज संकट से गुजर रहा था और कई देशों की अर्थव्यवस्था डगमगा रही थी। इसी दौरान द्रागी ने कहा था कि ‘यूरो को बचाने के लिए जो करना पड़ेगा, हम करेंगे।’ उनके इस बयान से बाजार में भरोसा लौटा और हालात धीरे-धीरे संभले। ECB के अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने ब्याज दरों में कटौती, बड़े पैमाने पर पैसा बाजार में डालने और सख्त फैसले लिए। इन कदमों की वजह से उन्हें मीडिया में ‘सुपर मारियो’ भी कहा जाने लगा। इसके बाद साल 2021 में इटली में राजनीतिक संकट के बीच मारियो द्रागी को प्रधानमंत्री बनाया गया। वे किसी चुनाव के जरिए नहीं, बल्कि राष्ट्रपति के कहने पर सरकार बनाने आए थे। प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने कोरोना महामारी के बाद देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने और यूरोपीय यूनियन से मिलने वाली मदद को सही तरीके से इस्तेमाल करने पर जोर दिया। हालांकि 2022 में राजनीतिक खींचतान के चलते उनकी सरकार गिर गई और उन्होंने प्रधानमंत्री पद छोड़ दिया। इसके बावजूद मारियो द्रागी को आज भी यूरोप और दुनिया के सबसे भरोसेमंद आर्थिक दिमागों में गिना जाता है।
—————- यह खबर भी पढ़ें… अमेरिका-चीन के बीच फंसा भारत:अब कम ताकतवर देशों से बढ़ा रहा दोस्ती, ट्रम्प के टैरिफ से बदली भारत की विदेश और व्यापार नीति कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने पिछले महीने स्विट्जरलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के मंच से कहा था कि दुनिया की पुरानी व्यवस्था ‘टूट’ रही है। अब मध्यम ताकत वाले देशों को साथ लाकर काम करना होगा। पढ़ें पूरी खबर…
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