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आईआईटी स्टूडेंट की मां से आखिरी बहस… फिर हत्या:सिजोफ्रेनिया पीड़ित ने पुलिस से कहा- मैंने मार डाला; परिवार ने सच्चाई छिपाने की कोशिश की

मां सब्जी काट रही थीं। उन्होंने मुझसे बाजार से कुछ सामान लाने को कहा। मैंने मना कर दिया, तो वह मुझ पर चिल्लाने लगीं। मुझे बहुत गुस्सा आया और मैंने पास रखे हंसिये से उन पर हमला कर दिया। ये कबूलनामा है आईआईटी बॉम्बे के स्टूडेंट नितेश झरबड़े का, जिसने 9 अक्टूबर को आवेश में आकर अपनी ही मां की हत्या कर दी। परिवार ने पहले इस मामले को छिपाने की कोशिश की थी। पुलिस की प्रारंभिक जांच में पता चला है कि नितेश एक मानसिक बीमारी ‘सिजोफ्रेनिया’ से पीड़ित है। पढ़ाई के दौरान मुंबई में उसने एक बार आत्महत्या करने की भी कोशिश की थी। पिछले दो साल से उसका इलाज भोपाल के एम्स अस्पताल में चल रहा था। बीमारी के कारण वह पिछले एक साल से अपने गांव में ही रह रहा था। सिजोफ्रेनिया ऐसी बीमारी है, जिसमें इंसान अदृश्य आवाजों से बात करता है, वह उसे दिशा निर्देश देती हैं। हालांकि, नितेश सच बोल रहा है या नहीं, पुलिस इसकी जांच कर रही है। फिलहाल, मां की हत्या के आरोप में वह जेल में है। नितेश को ये बीमारी कैसे हुई, परिवार ने पहले मामले को छिपाने की कोशिश क्यों की? इन सवालों का जवाब तलाशने भास्कर की टीम पहुंची बैतूल के मदनी गांव। यहां गांव वालों के साथ नितेश के परिवार से बात करने की कोशिश की। साथ ही एक्सपर्ट से समझा कि सिजोफ्रेनिया बीमारी क्या होती है? पढ़िए, रिपोर्ट… परिजन ने किया पुलिस को कॉल
9 अक्टूबर की रात, बोरदेही पुलिस स्टेशन के डायल 112 पर एक घबराया हुआ फोन आया। फोन करने वाले ने बताया कि मदनी गांव में इमला झरबड़े नाम की एक महिला घर में गिर गई है और उसे तत्काल मेडिकल सहायता की जरूरत है। सूचना मिलते ही थाना प्रभारी राधेश्याम वट्टी अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचे। घर का मंजर दिल दहला देने वाला था। 56 वर्षीय इमला खून से लथपथ जमीन पर पड़ी थीं। पुलिस ने बिना देर किए उन्हें स्थानीय सरकारी अस्पताल पहुंचाया, जहां से उन्हें आमला अस्पताल रेफर कर दिया गया। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी, डॉक्टरों ने इमला को मृत घोषित कर दिया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से हत्या किए जाने का खुलासा
पुलिस को घटनास्थल देखकर पहली नजर में ही यह मामला सिर्फ गिरने का नहीं लग रहा था। 10 अक्टूबर को पुलिस की टीम फिर से गांव पहुंची। पंचनामा के दौरान महिला के शरीर पर कई ऐसे गहरे घाव मिले, जो किसी हमले की ओर इशारा कर रहे थे। शक गहराने पर शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा गया। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने सारे राज खोल दिए। रिपोर्ट में डॉक्टरों ने लिखा कि इमला की मौत किसी धारदार हथियार से किए गए जानलेवा हमले से हुई थी। इसके बाद पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर जांच शुरू की। नितेश को पता चला- मां की मौत हो गई तो भाग निकला
परिवार ने पुलिस को बताया कि इमला सब्जी काटते वक्त गिर गई थीं। घर पर केवल इमला और बेटा नितेश ही मौजूद थे। इमला की बड़ी बेटी रोशनी, जो दिल्ली में CISF में तैनात है और दिवाली की छुट्टियों में घर आई थी, अपने पिता संतोष झरबड़े के साथ बाजार गई थी। जब पिता और बेटी बाजार से लौटे, तो उन्होंने इमला को खून से लथपथ जमीन पर पड़ा पाया और नितेश उनके पास बैठकर जोर-जोर से रो रहा था। नितेश ने ही सबको बताया कि मां गिर गई है। परिवार वाले उसे अस्पताल ले गए, लेकिन जैसे ही आमला अस्पताल में डॉक्टरों ने इमला को मृत घोषित किया, नितेश वहां से भाग निकला। एक ही बार में गुनाह कबूल किया
नितेश घर के पास ही नगर निगम के शौचालय में जाकर छिप गया और खुद को अंदर से बंद कर लिया। पुलिस ने दरवाजा तोड़कर उसे बाहर निकाला, लेकिन तब तक किसी को यह अंदाजा नहीं था कि कातिल वही है। जब पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में हत्या की पुष्टि हो गई, तो पुलिस ने परिवार से दोबारा सख्ती से पूछताछ की। इस बार परिवार टूट गया और उन्होंने कबूल किया कि इमला की हत्या हुई है। जब पुलिस ने नितेश से सवाल किया, तो उसने एक ही बार में अपना गुनाह कबूल कर लिया। उसने बताया, ‘मां मुझ पर चिल्लाईं तो मुझे बहुत गुस्सा आया और मैंने पास रखे हंसिये से उन पर हमला कर दिया।’ टीआई बोले- सिजोफ्रेनिया बीमारी से पीड़ित है नितेश
नितेश ने आठवीं तक की पढ़ाई गांव के स्कूल से की। फिर आगे की पढ़ाई के लिए भोपाल चला गया। भोपाल से B.Tech करने के बाद उसका सिलेक्शन M.Tech के लिए देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान IIT बॉम्बे में हो गया था, लेकिन अकादमिक सफलता के इस शिखर के पीछे एक गहरा अंधेरा छिपा था। पुलिस जांच में सामने आया कि नितेश ‘सिजोफ्रेनिया’ नामक गंभीर मानसिक बीमारी से जूझ रहा था। पढ़ाई के दौरान मुंबई में उसने एक बार आत्महत्या करने की भी कोशिश की थी। पिछले दो वर्ष से उसका इलाज भोपाल के एम्स अस्पताल में चल रहा था। बीमारी के कारण वह पिछले एक साल से अपने गांव में ही रह रहा था। गांव के लोगों ने बताया कि नितेश दिन भर घर में लैपटॉप पर लगा रहता था। वह न तो घर से बाहर निकलता था और न ही किसी से बात करता था। उसका परिवार भी गांव में किसी से कोई मतलब नहीं रखता था। पूरा परिवार गांव में अलग-थलग
गांव वालों ने बताया कि झरबड़े परिवार ही समाज से कटा हुआ था। वे न तो किसी के सुख-दुःख में शामिल होते थे और न ही गांव के किसी कार्यक्रम में हिस्सा लेते थे। गांव के ही मिथिलेश झरबड़े ने बताया कि नितेश के पिता संतोष झरबड़े गांव के सरकारी स्कूल में शिक्षक थे, लेकिन उन्हें सस्पेंड कर दिया गया था। मिथिलेश के मुताबिक, “संतोष अक्सर स्कूल में दूसरे शिक्षकों से झगड़ा करते थे और छात्रों के साथ मारपीट करते थे, जिसके कारण उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया था। उन्हें भी कुछ दिमागी बीमारी थी।”


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