‘अयोध्या केवल पर्यटन का केंद्र नहीं, सनातन की आत्मा है’:दिल्ली में पीठाधीश्वर मिथलेश शरण नंदिनी बोले- विकास कार्यों में जनसहभागिता होनी चाहिए
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‘अयोध्या केवल पर्यटन का केंद्र नहीं, सनातन की आत्मा है’:दिल्ली में पीठाधीश्वर मिथलेश शरण नंदिनी बोले- विकास कार्यों में जनसहभागिता होनी चाहिए
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में आयोजित तीन दिवसीय ‘अयोध्या पर्व’ के तीसरे दिन अयोध्या के मौजूदा विकास और उसके सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभावों को लेकर गंभीर विमर्श देखने को मिला। ‘भविष्य की अयोध्या शासन और समाज’ विषय पर आयोजित सातवें सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में हनुमत निवास के पीठाधीश्वर मिथलेश शरण नंदिनी ने करीब 55 मिनट के अपने उद्बोधन में कई तीखे सवाल उठाए। कार्यक्रम में चंपत राय और लल्लू सिंह भी मौजूद रहे। हालांकि, श्रोताओं के बीच चर्चा का केंद्र आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण का वक्तव्य ही बना रहा। विकास के नाम पर सांस्कृतिक पहचान पीछे छूटती जा रही डॉ. शरण ने कहा कि अयोध्या का जो विकास मॉडल प्रस्तुत किया जा रहा है, उसमें उसकी मूल आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान पीछे छूटती जा रही है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अयोध्या केवल पर्यटन या आधुनिकता का केंद्र नहीं, बल्कि उसकी आत्मा उसकी सनातन परंपरा में निहित है। अयोध्या-कश्मीर तुलना पर छिड़ी बहस अपने संबोधन में उन्होंने अयोध्या की तुलना कश्मीर से करते हुए कहा कि सुरक्षा व्यवस्था इतनी कठोर हो गई है कि आमजन की आवाजाही प्रभावित हो रही है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि बैरियर और प्रशासनिक नियंत्रण के चलते आपात स्थितियों में भी लोगों को कठिनाई का सामना करना पड़ता है। डॉ. मिथिलेश नंदिनी शरण ने कहा कि इस शर्त पर आपकी अयोध्या ऐसी हो गई है कि बिना पुलिस के जी हजूरी किए आप अयोध्या में घुस नहीं सकते है। पेशेंट मर जाएगा, लेकिन बैरियर नहीं खोला जाएगा। वह अस्पताल तक नहीं जाएगा। हम लोग सुनते रहे है कि कश्मीर को लोगों को सुरक्षा के नाम पर कितना दुख होता है, अब अयोध्या को लेकर यह समझते है। और तब आपके अपने लोग ही आपके शत्रु हो जाते है। कोई सुनाता नहीं है। प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल, संतों की उपेक्षा का आरोप आचार्य ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति की प्रशासनिक पहचान नहीं है, तो अयोध्या में जीवन कठिन हो सकता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि देशभर में पूज्य संतों को अयोध्या में अपेक्षित सम्मान नहीं मिल रहा। उनके अनुसार, कुछ लोगों को सुरक्षा देकर एक अलग माहौल बनाया जा रहा है, जिससे संत समाज असहज महसूस करता है। ‘हनीमून डेस्टिनेशन’ वाले बयान पर चर्चा सत्र के दौरान उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि“अगर लोग हनीमून के लिए गोवा छोड़कर अयोध्या आ रहे हैं, तो क्या यही विकास है?” उनका यह बयान सभागार में चर्चा का विषय बन गया और विकास की दिशा को लेकर नई बहस छेड़ दी। शिक्षा और सांस्कृतिक संसाधनों की कमी पर चिंता उन्होंने कहा कि अयोध्या के विकास में स्थानीय साधु-संतों और नागरिकों की भूमिका नगण्य हो गई है। उनके अनुसार, विकास की प्रक्रिया में स्थानीय समाज की भागीदारी सुनिश्चित किए बिना संतुलित परिणाम संभव नहीं हैं। ‘अयोध्या अपनी प्रतिक्रिया खुद देगी’ अपने संबोधन के अंत में आचार्य ने कहा कि “अयोध्या अयोध्या है, जिसे कोई जीत नहीं सकता। वह अपने साथ हुए अन्याय का उत्तर समय आने पर स्वयं देती है।” इस वक्तव्य ने पूरे सत्र को एक गंभीर वैचारिक दिशा दे दी। आचार्य ने अपने 55 मिनट के उद्बोधन में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तार के साथ चर्चा करते हुए प्रश्नचिन्ह लगाए है। उन्होंने अयोध्या के विकास पर भी प्रश्न चिन्ह उठाए हुए कहा कि अयोध्या के विकास के लेकर स्थानीय साधु संतों और स्थानीय नागरिकों की भूमिका शून्य है। कार्यक्रम में मौजूद कई लोगों ने उनके भाषण को पूरी तरह सच के करीब बताया, जबकि कुछ के लिए यह आश्चर्य का विषय रहा कि दिल्ली के मंच से इतने स्पष्ट शब्दों में अयोध्या की स्थिति पर टिप्पणी की गई।
Source: Dainik Bhaskar via DNI News
