भागलपुर के कचहरी परिसर में अखिल भारतीय अंगिका साहित्य कला मंच ने ‘जीवन में मातृभाषा का महत्व’ विषय पर एक परिचर्चा गोष्ठी का आयोजन किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. मधुसूदन झा ने की, जबकि कार्यकारी अध्यक्ष एवं गीतकार राजकुमार ने इसका संचालन किया। इस गोष्ठी में बड़ी संख्या में साहित्यकार, अधिवक्ता, समाजसेवी और बुद्धिजीवी शामिल हुए। इनमें समाजसेवी सुबोध मंडल, अधिवक्ता प्रीति कुमारी, सुनील कुमार, मोकिम आलम, कवि-साहित्यकार त्रिलोकीनाथ दिवाकर, कृष्ण मोहन किसलय, प्रीतम विश्वकर्मा ‘कवियाठ’, रूप कुमार, मुरारी प्रसाद यादव और गौरांग सेवक जैसे गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि मातृभाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्ति की पहचान, संस्कृति और भावनात्मक जुड़ाव का आधार है। वक्ताओं ने जोर दिया कि मातृभाषा का संबंध सीधे मां और हृदय से जुड़ा होता है, जिसके बिना किसी भी समाज की वास्तविक उन्नति और विकास संभव नहीं है। उन्होंने नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। वक्ताओं ने चेतावनी दी कि यदि मातृभाषा का संरक्षण और संवर्धन नहीं किया गया, तो हमारी सांस्कृतिक विरासत धीरे-धीरे विलुप्त हो सकती है। इस दिशा में साहित्यिक मंचों और सामाजिक संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण बताई गई। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. मधुसूदन झा ने अंगिका भाषा को विश्वविद्यालय स्तर पर पढ़ाए जाने का उल्लेख किया। उन्होंने दुख व्यक्त किया कि अंगप्रदेश की प्राचीन और प्रतिष्ठित भाषा अंगिका को अब तक सरकार की ओर से कोड नंबर आवंटित नहीं किया गया है। प्रो. झा ने अंग भाषियों की ओर से रोष जताते हुए सरकार से तत्काल अंगिका भाषा को कोड नंबर प्रदान करने और संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल करने के लिए आवश्यक कदम उठाने की मांग की। गोष्ठी का समापन मंच के राष्ट्रीय कार्यकारी महामंत्री और संयोजक कविवर त्रिलोकीनाथ दिवाकर द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
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