नागपुर में साल 1985 में एक अविवाहित मां ने अपने 3 दिन के बच्चे को एक शेल्टर होम में छोड़ दिया। एक महीने बाद नीदरलैंड से भारत घूमने आए एक कपल ने उसे गोद ले लिया और अपने साथ ले गए। इस घटना को 41 साल बीत चुके हैं। वह बच्चा अब नीदरलैंड की राजधानी एम्स्टर्डम के पास मौजूद शहर हीमस्टेड का मेयर बन गया है। हीमस्टेड के मेयर फाल्गुन बिन्नेन्डिज्क अब अपनी मां को ढूंढ़ने चाहते हैं। वे आखिरी बार दिसंबर 2025 में भारत आए थे। ये जानकारी अब सामने आई है। फाल्गुन का कहना है- मैंने महाभारत पढ़ी है और मुझे लगता है कि हर कर्ण को कुंती से मिलने का अधिकार है। मैं अपनी मां से सिर्फ एक बार मिलना चाहता हूं और बताना चाहता हूं कि मुझे बड़े प्यार से बड़ा किया गया है। शेल्टर होम की नर्स ने ‘फाल्गुन’ नाम रखा फाल्गुन का जन्म 10 फरवरी, 1985 में हुआ। उनकी मां उन्हें नागपुर के ‘मातृ सेवा संघ’ नाम के एक शेल्टर होम में छोड़ गई थीं, जहां वे करीब एक महीने तक रहे। शेल्टर होम की नर्स ने उन्हें फाल्गुन नाम दिया। हिंदू कैलेंडर के मुताबिक, फाल्गुन महीने में ही बच्चे का जन्म हुआ था। फाल्गुन 2025 में तीन बार भारत आए। दिसंबर में उन्हें एक अधिकारी की मदद से शेल्टर होम की उस नर्स का पता चला, जो फाल्गुन के जन्म के समय वहां काम करती थीं। वे अब रिटायर हो चुकी है। फाल्गुन अगस्त 2025 में नागपुर आए थे। नागपुर कलेक्टर विपिन इटांकर की मदद से वे उस नर्स के घर भी गए, जहां उन्हें पता चला कि उनका नाम नर्स ने ही रखा था। नर्स से मिलकर फाल्गुन ने कहा, ‘मैं उनसे मिलकर बहुत खुश हुआ। उस महिला से मिलना एक कभी न भूलने वाला अनुभव था, जिसने मुझे मेरी पहचान दी।’ मां ने 3 दिन के फाल्गुन को क्यों छोड़ा नागपुर नगर पालिका आयुक्त अभिजीत चौधरी ने फाल्गुन के जन्म से जुड़े दस्तावेज ढूंढ़ने में मदद की। दस्तावेजों में ये जानकारी सामने आई कि फाल्गुन की मां एक 21 साल की अविवाहिता थी, जो समाज के डर से उनका पालन-पोषण नहीं कर सकती थी। इसलिए उन्हें शेल्टर होम में छोड़ गई। दस्तावेजों में फाल्गुन और उनकी मां का नाम दर्ज है। हालांकि, फाल्गुन ने उनकी मां का नाम सार्वजनिक नहीं किया है। मातृ सेवा संघ अनाथ बच्चों और पीड़ित महिलाओं के लिए बनाया गया एक शेल्टर होम है। शेल्टर होम के अधिकारियों के मुताबिक, यहां अक्सर अविवाहित माताएं अपने नवजात बच्चों को छोड़ जाती हैं। 2006 में पहली बार भारत आए फाल्गुन फाल्गुन नीदरलैंड में डच दंपत्ति के घर पले-बढ़े। उन्होंने छोटी उम्र में ही ये बात जान ली थी कि उनकी जड़ें भारत में है। बचपन में उन्हें भारत के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी, लेकिन जैसे-जैसे वे बड़े हुए, उनके मन में अपनी मां से मिलने की इच्छा जागने लगी। फाल्गुन 2006 में पहली बार भारत आए, जब उनकी उम्र 18 साल थी। उन्होंने दक्षिण भारत की यात्रा की और वहां तरह-तरह के पकवान भी खाए। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्हें पहली बार भारत आकर ही भारतीय संस्कृति से जुड़ाव महसूस होने लगा। फाल्गुन को लगा कि वे भारत की जगहों और लोगों को काफी समय से जानते हैं। फाल्गुन बोले- मुझे लगता है मां भी मुझसे मिलने चाहती होंगी फाल्गुन से जब पूछा गया कि उन्हें अपनी मां से मिलकर कैसा लगेगा, तो उन्होंने कहा मुझे ठीक वैसा ही लगेगा, जैसा एक मां को 40 साल बाद अपने बच्चे से मिलकर लगेगा। फाल्गुन कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि उन्हें अभी भी इस बात का दुख है कि जो उन्होंने किया, वह ठीक नहीं था।’ फाल्गुन ने इंटरव्यू में बताया कि वे अगले साल फिर नागपुर लौटकर अपनी मां की खोज शुरू करेंगे। उन्होंने अपनी मां को ढूंढने के लिए कई NGO, नगर पालिका और पुलिस की मदद मांगी है। नीदललैंड के हीमस्टेड से मेयर हैं फाल्गुन फाल्गुन हीमस्टेड शहर के मेयर हैं। हीमस्टेड नीदरलैंड की राजधानी एम्स्टर्डम से 30 किलोमीटर की दूरी पर है। फाल्गुन ने नीदरलैंड में एक डच महिला से शादी की। दोनों के चार बच्चे हैं। फाल्गुन कहते हैं कि उनकी पत्नी उन्हें हमेशा से अपनी जड़ों को खोजने के लिए प्रेरित करती हैं। उन्होंने अपनी बेटी का नाम अपनी मां के नाम पर रखा है। ——————————
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