सरकारी स्कूलों के बच्चों के लिए शनिवार का दिन किसी सपने जैसा रहा। जब ये बच्चे आईआईटी कानपुर के भारी-भरकम गेट से अंदर दाखिल हुए, तो उनके मन में कई सवाल थे। उत्तर प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के सहयोग से आयोजित इस खास टूर में कानपुर के 10 स्कूलों के 100 बच्चों ने हिस्सा लिया। यहां उन्होंने किताबों में रटी जाने वाली डेंसिटी और बायोलॉजी को अपनी आंखों के सामने हकीकत में बदलते देखा। आईआईटी के रंजीत सिंह रोज़ी शिक्षा केंद्र में छात्र स्वयंसेवकों ने बच्चों को एक चलता-फिरता सबमरीन का मॉडल दिखाया। इसके जरिए बच्चों को घनत्व यानी डेंसिटी का सिद्धांत समझाया गया। आमतौर पर क्लासरूम में उबाऊ लगने वाला यह टॉपिक बच्चों को तब बहुत आसान लगा, जब उन्होंने देखा कि कैसे वजन और पानी के तालमेल से चीजें डूबती और तैरती हैं। बच्चों ने सिर्फ देखा ही नहीं, बल्कि खुद भी कई प्रयोग करके देखे। क्या लंबाई बढ़ सकती है? एक्सपर्ट्स से पूछे तीखे सवाल बायोलॉजी के सत्र में प्रो.संतोष मिश्रा और पीएचडी छात्र तमोजित सान्त्रा ने जब ‘हमारे आसपास की जीव विज्ञान’ पर बात शुरू की, तो सवालों की झड़ी लग गई। कक्षा 9 से 12 तक के इन छात्रों ने ऐसे सवाल पूछे जो उनकी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े थे। एक छात्र ने पूछा कि ‘चोट लगने पर जब हम स्प्रे करते हैं, तो दर्द तुरंत कैसे गायब हो जाता है?’ वहीं किसी ने अपनी बढ़ती उम्र को लेकर पूछा कि ‘क्या वाकई लंबाई बढ़ाई जा सकती है?’ एक्सपर्ट्स ने किताबी भाषा छोड़कर बहुत ही सरल उदाहरणों के साथ बच्चों की इन शंकाओं को दूर किया। लैब में टेस्टिंग देखी और एयरस्ट्रिप पर समझा विज्ञान सिर्फ लेक्चर ही नहीं, बच्चों को आईआईटी की मटेरियल टेस्टिंग लैब और एयरस्ट्रिप पर भी ले जाया गया। वहां डॉ. एस.के. अग्निहोत्री ने बच्चों को बताया कि विज्ञान सिर्फ लैब तक सीमित नहीं है, बल्कि आसमान में उड़ते जहाज से लेकर सड़क पर चलने वाली गाड़ियों तक, हर जगह विज्ञान ही काम कर रहा है। लैब में मशीनों को काम करते देख बच्चे काफी उत्साहित नजर आए। जिज्ञासा बनी रहे, तो वैज्ञानिक बनना मुश्किल नहीं
इस पूरे शैक्षणिक भ्रमण का मकसद बच्चों के भीतर के ‘वैज्ञानिक’ को जगाना था। कार्यक्रम में मौजूद डॉ. किरण प्रजापति, प्रो. सुधांशु और रीता सिंह ने बच्चों को प्रेरित किया कि वे कभी भी सवाल पूछना बंद न करें। उन्होंने कहा कि किताबों से बाहर निकलकर जब हम ‘क्यों’ और ‘कैसे’ पर गौर करते हैं, तभी असली सीख शुरू होती है। शाम को जब बच्चे वापस लौटे, तो उनके पास न सिर्फ विज्ञान की नई जानकारी थी, बल्कि भविष्य में कुछ बड़ा करने का एक नया हौसला भी था।

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