इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी की नियुक्ति प्रक्रिया वैध रही हो और वह लगातार सेवा में रहा हो, तो उसकी तदर्थ (अस्थायी) सेवा को पदोन्नति के लिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने आदेश दिया है कि नियमित सेवा के साथ-साथ तदर्थ सेवाकाल की भी गणना की जाएगी। न्यायमूर्ति शेखर बी सराफ और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने राज्य सरकार की दो विशेष अपीलों को खारिज करते हुए यह निर्णय सुनाया। यह मामला एडहॉक सेवा को पदोन्नति में शामिल करने से संबंधित था। याचिकाकर्ताओं अनिल कुमार और शैलेंद्र सिंह आवास एवं शहरी नियोजन विभाग में जूनियर इंजीनियर के पद पर कार्यरत थे। उनकी नियुक्ति वर्ष 1986 में तदर्थ आधार पर हुई थी, जिसके बाद उनकी सेवाओं को नियमित किया गया था। विवाद तब शुरू हुआ जब उनके बाद नियुक्त हुए कर्मचारियों को 18 जनवरी 1995 से सहायक अभियंता के पद पर पदोन्नति दे दी गई, लेकिन याचिकाकर्ताओं को इस लाभ से वंचित रखा गया। राज्य सरकार ने तर्क दिया था कि उस समय तक याचिकाकर्ताओं की सेवाएं नियमित नहीं हुई थीं, इसलिए उन्हें पिछली तिथि से पदोन्नति नहीं दी जा सकती। न्यायालय ने राज्य सरकार के इस तर्क को अस्वीकार कर दिया। खंडपीठ ने कहा कि यदि कोई कर्मचारी लगातार सेवा में रहा है और उसकी प्रारंभिक नियुक्ति वैध प्रक्रिया के तहत हुई है, तो उसके तदर्थ सेवाकाल को भी पदोन्नति के लिए गिना जाएगा। न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए यह भी कहा कि समान परिस्थितियों में अन्य कर्मचारियों को पहले ही यह लाभ दिया जा चुका है। ऐसे में याचिकाकर्ताओं को इससे वंचित रखना न्यायसंगत नहीं होगा।

Leave a Reply