मिर्जापुर में चैत्र नवरात्र के तीसरे दिन आदिशक्ति माँ विंध्यवासिनी के चंद्रघंटा स्वरूप की पूजा की गई। इस अवसर पर माता के दरबार में श्रद्धालुओं का भारी सैलाब उमड़ा। भक्त विधि-विधान से पूजन-अर्चन कर रहे हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चंद्रघंटा स्वरूप भक्तों को शीतलता, शांति और साहस प्रदान करता है, साथ ही उनकी समस्त मनोकामनाएं भी पूर्ण करता है। माँ विंध्यवासिनी का यह स्वरूप विंध्य पर्वत और पावन गंगा नदी के संगम तट पर स्थित है। माँ चंद्रघंटा दस भुजाओं वाली हैं और सिंह पर आरूढ़ हैं। उनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है, जिसके कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माँ अपने घंटे की दिव्य ध्वनि से दुष्टों का संहार करती हैं और भक्तों के कष्टों का नाश करती हैं। विद्वान आचार्य पं. राजन मिश्र ने बताया कि मंदिरों में घंटा बजाने का धार्मिक के साथ-साथ वैज्ञानिक महत्व भी है। इससे साधकों का मणिपूरक चक्र जागृत होता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। नवरात्र के तीसरे दिन माँ विंध्यवासिनी धाम में श्रद्धालुओं का उत्साह चरम पर देखा गया। दूर-दराज से आए भक्त माँ के दर्शन कर स्वयं को धन्य महसूस कर रहे हैं। उनका विश्वास है कि माँ चंद्रघंटा की आराधना से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आता है और समयचक्र अनुकूल होता है। कई भक्त वर्षों से नियमित रूप से नवरात्र में देवी पाठ और साधना करते आ रहे हैं। उनका कहना है कि माँ ने उनकी हर मनोकामना पूर्ण की है। नवरात्र के नौ दिनों में माँ के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा कर भक्त अपने समस्त कष्टों से मुक्ति पाते हैं। माँ चंद्रघंटा के दर्शन मात्र से ही मन, शरीर और आत्मा में नई ऊर्जा, उत्साह और सकारात्मक विचारों का संचार होता है। विंध्य धाम में माँ के दिव्य दर्शन कर श्रद्धालु आध्यात्मिक शांति का अनुभव कर रहे हैं और “जय माँ विंध्यवासिनी” के जयकारों के साथ अपनी आस्था व्यक्त कर रहे हैं।

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