शहर के कंक्रीट के जंगलों में खो चुकी नन्ही गौरैया अब फिर से आंगन में चहकने लगी है। विश्व गौरैया दिवस के अवसर पर किदवई नगर स्थित सोटे वाले हनुमान जी चौराहे पर एक खास जागरूकता अभियान चलाया गया। ‘स्वीट स्पैरो कम बैक होम’ और ‘सेवादान सोसाइटी’ के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित इस कार्यक्रम में लोगों को गौरैया के कृत्रिम घोंसले और फीडर बांटे गए, ताकि इस बेजुबान परिंदे को फिर से अपना आशियाना मिल सके। वैज्ञानिक घोंसलों का जादू और बदली तस्वीर अभियान के सिटी कोऑर्डिनेटर अजय विश्वकर्मा ने बताया कि आधुनिक मकानों के डिजाइन में अब गौरैया के लिए पुरानी जगह नहीं बची है। पहले घरों के रोशनदानों और झरोखों में गौरैया अंडे देती थी, लेकिन अब जगह न मिलने के कारण उसके बच्चे गिरकर मर जाते थे। पिछले 12 वर्षों से वैज्ञानिक तरीके से तैयार घोंसले लगाने का बेहद सकारात्मक परिणाम दिखा है और कई इलाकों में गौरैया की संख्या में 10 गुने से ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इन घोंसलों में सिर्फ गौरैया ही नहीं, बल्कि गिलहरी, रोबिन, तोते और इंडियन सिल्वरबिल जैसे अन्य छोटे पंछी भी डेरा डाल रहे हैं। नन्हीं जान बचाने के आसान तरीके अजय विश्वकर्मा के अनुसार गौरैया को बचाने के लिए बस कुछ छोटे कदम उठाने होंगे। घोंसले को छज्जे के नीचे जमीन से करीब 9-10 फीट की ऊंचाई पर लगाना चाहिए। खाने के लिए गर्मियों में उबले चावल, खील और काकून दें, जबकि सर्दियों में इन्हें बाजरा अधिक पसंद है। साथ ही घर के आसपास कनेर, नींबू, शमी, बोगनविलिया और मालती जैसे झाड़ीदार पेड़ लगाने चाहिए ताकि ये पंछी खुद को शिकारियों से सुरक्षित महसूस कर सकें। अनियंत्रित छंटाई बनी पंछियों का काल सेवादान सोसाइटी के संयोजक आशुतोष त्रिपाठी ने एक गंभीर मुद्दे की ओर ध्यान खींचते हुए बताया कि नगर निगम और बिजली विभाग द्वारा पेड़ों की अनियंत्रित छंटाई पंछियों के लिए जानलेवा साबित हो रही है। अक्सर पेड़ों को 80 से 100 प्रतिशत तक छांट दिया जाता है, जिससे वहां रह रहे जीव-जंतुओं का अस्तित्व ही खत्म हो जाता है। उन्होंने सलाह दी कि पेड़ों की छंटाई सिर्फ जून-जुलाई में होनी चाहिए ताकि बारिश में वे दोबारा पनप सकें। फरवरी-मार्च में छंटाई बिल्कुल नहीं करनी चाहिए क्योंकि यह पंछियों के प्रजनन और बच्चों के बड़ा होने का समय होता है। मिसाल बना किदवई नगर का ‘गौरैया भवन’ अभियान के संस्थापक गौरव बाजपेई ने बताया कि अब तक इस अभियान के माध्यम से करीब 8500 घोंसले खुद लगवाए जा चुके हैं, जबकि जन सहयोग से यह आंकड़ा 25,000 के पार पहुंच गया है। वहीं किदवई नगर के प्रकाश और नीता धवन दंपति ने अपने घर को ‘गौरैया भवन’ में तब्दील कर एक अनूठी मिसाल पेश की है। उनका कहना है कि दाना-पानी हमेशा ऐसी खुली ऊंचाई पर रखें जहां पंछी बिल्ली के आने पर तुरंत उड़ सकें। इस जागरूकता अभियान में सात्विक त्रिपाठी, हार्दिक, उपासना, सोनाली त्रिवेदी और दीपक राणा सहित कई पर्यावरण प्रेमियों ने सक्रिय सहभागिता की।

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