कल तक जो गौरैया हमारे आंगन में चहकती थी, आज वह मोबाइल टावरों और कंक्रीट के जंगलों के बीच कहीं खो गई है। विलुप्त होती इसी नन्हीं जान को बचाने के लिए ‘विश्व गौरैया दिवस’ पर एक अनोखी डिजिटल मुहिम शुरू हुई। ‘आईसीटी की पाठशाला’ की इस पहल ने न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि देश के कई राज्यों के लोगों को एक मंच पर ला दिया। इस ऑनलाइन कार्यक्रम के जरिए 4500 से ज्यादा शिक्षकों, छात्रों और अभिभावकों ने गौरैया को बचाने और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने की शपथ ली। ऑनलाइन क्विज से जानी गौरैया की अहमियत सिर्फ भाषणबाजी के बजाय इस मुहिम में तकनीक का सहारा लिया गया। ‘आईसीटी की पाठशाला’ के संस्थापक और स्टेट आईसीटी अवॉर्डी शिक्षक शेखर यादव के नेतृत्व में एक विशेष ऑनलाइन क्विज़ का आयोजन हुआ। इसमें लोगों ने गौरैया के जीवन, उनकी घटती संख्या के कारणों और उन्हें बचाने के तरीकों के बारे में जाना। इस डिजिटल पहल का असर यह रहा कि लोग केवल जुड़े ही नहीं, बल्कि उन्होंने गौरैया के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी समझा। यूपी समेत कई राज्यों में पहुंचा संदेश इस मुहिम की गूंज सिर्फ प्रयागराज तक सीमित नहीं रही। उत्तर प्रदेश के साथ-साथ देश के अन्य राज्यों के लोगों ने भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। माध्यमिक शिक्षा परिषद् के उपसचिव अनिल कुमार यादव ने इस पहल की सराहना करते हुए सभी प्रतिभागियों को डिजिटल हस्ताक्षर वाले ई-सर्टिफिकेट जारी किए। उन्होंने कहा कि आधुनिकता की दौड़ में हम प्रकृति के इन छोटे साथियों को भूलते जा रहे हैं, ऐसे में यह डिजिटल जागरूकता सराहनीय है। छोटे प्रयास बड़ा बदलाव,अब घर-घर लगेंगे दाना-पानी के सकोरे शिक्षक शेखर यादव ने बताया कि,कार्यक्रम का असली मकसद लोगों को मानसिक रूप से तैयार करना है। गौरैया को बचाने के लिए किसी बड़े बजट की जरूरत नहीं है, बल्कि हमारे छोटे-छोटे प्रयास ही काफी हैं। कार्यक्रम के अंत में हजारों लोगों ने संकल्प लिया कि वे अपने घरों की छतों और बालकनी में गौरैया के लिए दाना-पानी रखेंगे और उनके सुरक्षित आवास (घोंसलों) के लिए जगह बनाएंगे।
गौरैया बचाने के 3 आसान तरीके
मिट्टी के बर्तन: गर्मी के दिनों में छत या बालकनी में पानी भरकर रखें। देशी अनाज: बाजरा, चावल या छोटे अनाज के दाने डालें। कृत्रिम घोंसले: अगर पेड़ नहीं हैं, तो जूतों के डिब्बे या लकड़ी के छोटे बॉक्स से कृत्रिम घर बनाएं।

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