चैत्र नवरात्र के दूसरे दिन भृगु क्षेत्र बलिया के विभिन्न देवी मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। श्रद्धालुओं ने माता रानी का पूजन-अर्चन कर अपनी मनोकामनाएं मांगीं। ब्रह्म बेला से पूर्व ही भक्त मंदिरों की ओर निकल पड़े और पूजन-अर्चन में लीन हो गए। ‘जय माता दी’ जैसे भक्तिमय उच्चारणों से भृगुक्षेत्र का वातावरण गुंजायमान होता रहा। देवी मंदिरों को कहीं प्राकृतिक फूलों से तो कहीं आकर्षक झालरों से सजाया गया है। बलिया जिले के मां मंगला भवानी मंदिर, उचेड़ा स्थित मां भवानी मंदिर, शंकरपुर स्थित मां शांकरी भवानी मंदिर, ब्रह्माइन स्थित मां ब्रह्माणी देवी मंदिर, खरीद स्थित माता मंदिर, सिकंदरपुर स्थित जल्पा-कल्पा देवी मंदिर, गायघाट स्थित मां पचरूखा देवी मंदिर, पचदेवी मंदिर, कपूरी स्थित मां कपिलेश्वरी भवानी मंदिर, जनपद मुख्यालय स्थित मां दुर्गा मंदिर, शोभनाथपुर स्थित मां भगवती मंदिर, दुर्जनपुर स्थित मां काली मंदिर, रेवती स्थित मां दुर्गा मंदिर, काली माता मंदिर, बांसडीह स्थित मां दुर्गा मंदिर और सहतवार स्थित मां दुर्गा मंदिर सहित अनेक देवी मंदिरों में भक्तों का तांता लगा रहा। विभिन्न देवी मंदिरों के प्रांगण और आस-पास चुनरी, प्रसाद, फूलों सहित अन्य दुकानें सजी हुई थीं। मंदिरों पर मेले भी लगे थे, जहां पूजन-अर्चन के बाद श्रद्धालु अपनी जरूरत के सामानों की खरीदारी कर रहे थे। भक्तों की उमड़ती भीड़ को देखते हुए, श्रद्धालुओं को कोई परेशानी न हो, इसके लिए स्वयंसेवक (वालेंटियर) तैनात किए गए थे। दुर्गा सप्तशती व मारकंडेय पुराण में वर्णित है मां ब्रम्हाणी देवी मन्दिर
जिला मुख्यालय से पांच किमी उत्तर बलिया-सिकंदरपुर मुख्य मार्ग पर ब्रह्माइन गांव स्थित मां ब्राह्मणी देवी का प्राचीन मंदिर का उल्लेख दुर्गा सप्तशती व मारकंडेय पुराण में वर्णित है।
भवन के राजाओं से हार कर राजा सूरथ कुछ सैनिकों के साथ शिकार खेलने के बहाने निकल गए। आज जहां ब्रह्माइन गांव स्थित है, कालांतर में वहां जंगल था। राजा सूरथ वहीं रुके और सैनिकों से पानी लाने को कहा। सैनिकों ने कुछ ही दूर स्थित एक सरोवर से पानी लाकर राजा को दिया। जलास्पर्श करते ही राजा के घाव हुए ठीक
राजा युद्ध में घायल हो गए थे और शरीर के कई जगह से घाव बन गये थे। राजा ने जब उस पानी का स्पर्श किया तो घाव ठीक हो गया। राजा सैनिकों से पूछ सरोवर तक गये और स्नान किया। तो राजा के पूरे शरीर का घाव ठीक हो गया। राजा ने विचार किया कि निश्चय ही ये स्थान कोई पवित्र जगह है। सैनिकों को भेजकर राजा अकेले ही विचरण करने लगे वहीं पर उन्हें एक आश्रम दिखाई दिया। वह आश्रम महर्षि मेधा का था। महर्षि से उचित सत्कार पाकर राजा उनके आश्रम में विचरण करने लगे। कुछ दिनों बाद वहां पर एक समाधि नाम का वैश्य आया। जिसे उसके परिजनों ने धन के लोभ में घर से निकाल दिया था। राजा सूरथ व समाधि ने ऋषि मेधा से शांति पाने का उपाय पूछा। ऋषि ने आदि शक्ति की उपासना को कहा। वहीं पर राजा सूरथ व समाधि ने मां ब्रह्माणी की तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां ब्रह्माणी देवी अवतरित हुई दोनों को मनोवांछित फल देकर अभिलाशित किया। ृ

Leave a Reply