शहर के गणेश शंकर विद्यार्थी मेमोरियल (GSVM) मेडिकल कॉलेज में अब मरीजों की निगरानी हाईटेक तरीके से होगी। हैलट अस्पताल में जल्द ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक से लैस विशेष ‘डूजी बेड’ लगाए जाएंगे। इन बेड्स की सबसे बड़ी खूबी यह है कि मरीज की हालत बिगड़ने से कई घंटे पहले ही ये डॉक्टर और नर्स के मोबाइल पर अलर्ट भेज देंगे। इससे डॉक्टर मरीज के कोलैप्स होने यानी ‘कोड ब्लू’ की स्थिति आने से पहले ही उसे बचा सकेंगे। प्रिंसिपल डॉ. संजय काला ने बताया कि सरकार द्वारा तैयार किए गए दो शानदार वार्डों को इन स्मार्ट बेड्स से लैस करने की तैयारी है। शुरुआती चरण में कम से कम 30 बेड्स को पूरी तरह से AI आधारित बनाया जाएगा। इसके लिए सीएसआर (CSR) फंड के माध्यम से प्रयास किए जा रहे हैं। मौत को मात देगी तकनीक, मोबाइल पर दिखेगी ‘रेड लाइन’ अस्पताल में अक्सर देखा जाता है,कि जब मरीज की स्थिति अचानक खराब होती है, तब ‘कोड ब्लू’ अनाउंस किया जाता है। ऐसी स्थिति में मरीज को बचाने के लिए सीपीआर देना पड़ता है, जिसमें सफलता की दर केवल 50 प्रतिशत तक ही रहती है। कई बार डॉक्टर के पहुंचने से पहले ही मरीज दम तोड़ देता है। डॉ. संजय काला ने बताया कि, ये स्मार्ट बेड मरीज के शरीर में होने वाले छोटे से छोटे बदलाव को भी पकड़ लेंगे। अगर मरीज का ब्लड प्रेशर गिर रहा है या उसकी धड़कनें असामान्य हो रही हैं, तो डॉक्टर या नर्स के मोबाइल और टैबलेट पर तुरंत एक ‘रेड लाइन’ दिखने लगेगी और अलार्म बजने लगेगा। इससे डॉक्टर तुरंत मरीज के पास पहुंचकर इलाज शुरू कर देंगे। ‘मेक इन इंडिया’ के तहत बने हैं ये स्पेशल बेड
जीएसवीएम में लगने वाले ये बेड पूरी तरह स्वदेशी यानी ‘मेक इन इंडिया’ तकनीक पर आधारित हैं। फिलहाल इस सुविधा का इस्तेमाल कुछ बड़े प्राइवेट अस्पतालों में ही हो रहा है, लेकिन सरकारी क्षेत्र में जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज इसे अपनाने की दिशा में बड़ा कदम उठा रहा है। ये बेड पल-पल की रिपोर्ट जनरेट करेंगे, जिससे यह कमी भी दूर हो जाएगी कि हर वक्त एक डॉक्टर या अटेंडेंट मरीज के पास मौजूद नहीं रह सकता। वॉर्ड्स का होगा कायाकल्प, भविष्य में और होंगे अपग्रेड
मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने 60 बेड्स के दो नए वार्ड तैयार किए हैं। भविष्य में जैसे-जैसे नई तकनीक आएगी, इन बेड्स को और अधिक अपग्रेड किया जाएगा। डॉ. संजय काला ने बताया कि, हमारा मुख्य उद्देश्य मरीजों की जान बचाना है। इस तकनीक के आने से अननेसेसरी ‘कोड ब्लू’ की स्थिति कम होगी और हम समय रहते गंभीर मरीजों को बेहतर इलाज दे पाएंगे। इससे न केवल इलाज की गुणवत्ता सुधरेगी, बल्कि मेडिकल स्टाफ पर भी निगरानी का बोझ थोड़ा कम होगा।

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