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Yes Milord | वोटर लिस्ट पर अंतिम मुहर सरकार नहीं, न्यायपालिका की निगरानी में लगेगी, SIR पर SC ने बंगाल का चुनाव पलट दिया!

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सुप्रीम कोर्ट से आज ऐसा झटका लगा जिसने चुनाव से पहले पूरी सियासत को हिला दी है। आज सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि एसआईआर पर राज्य सरकार और इलेक्शन कमीशन के बीच चल रहा टकराव बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और अब इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी न्यायिक अधिकारियों की देखरेख में होगी। अदालत नेक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को आदेश दिया कि जिला जज और एडीजे स्तर के बेदाग रिकॉर्ड वालेअधिकारियों को इस काम में लगाया जाए जो लोगों के दावे और आपत्तियों पर फैसला करेंगे। यानी अब वोटर लिस्ट पर अंतिम मोहर सरकार नहीं न्यायपालिका की निगरानी में लगेगी। तो ये फैसला ममता सरकार के लिए बड़ा चुनावी झटका माना जा रहा है क्योंकि जिस प्रक्रिया पर सत्ता का नियंत्रण माना जा रहा था वही अब कोर्ट की निगरानी में चली गई है। अब साफ संदेश यह है कि बंगाल में अब चुनावी खेल नियमों से होगा ना कि सत्ता की शर्तों पर और यही वजह है कि इस फैसले को दीदी की राजनीति के लिए बड़ा झटका और आने वाले चुनाव का टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है। तो आज सुप्रीम कोर्ट के फैसले को समझेंगे। बताएंगे कि कैसे ममता बनर्जी के लिए बैटल ऑफ बंगाल बड़ा मुसीबत बनता जा रहा है। 

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क्या है पूरा मामला

पश्चिम बंगाल में एसआईआर मसले परसुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच विश्वास की कमी है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि ये न्यायिक अधिकारी एसआईआर प्रक्रिया में निर्वाचन रजिस्ट्रेशन अधिकारियों (ईआरओ) के कार्य का निर्वहन करेंगे। यह कदम इस विवाद के मद्देनजर उठाया गया कि क्या राज्य ने चुनाव आयोग (ईसीआई) को ईआरओ के रूप में कार्य करने के लिए पर्याप्त संख्या में एसडीएम रैंक (ग्रुप बी) के अधिकारी उपलब्ध कराए है या नहीं? राज्य सरकार ने अपनी ओर से चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त माइक्रो-ऑब्जर्वर और विशेष रोल ऑब्जर्वर पर आपत्ति जताई थी। बेंच ने आदेश में कहा कि दोनों संवैधानिक बॉडी यानी लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच दुर्भाग्यपूर्ण आरोप-प्रत्यारोप और दोषारोपण की स्थिति से स्पष्ट है कि उनके बीच विश्वास का अभाव है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्षों की सहमति को देखते हुए, हमारे पास लगभग कोई अन्य विकल्प नहीं है सिवाय इसके कि हम कलकत्ता हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से अनुरोध करते हैं कि वे वर्तमान में कार्यरत न्यायिक अधिकारियों और अतिरिक्त जिला न्यायाधीश या जिला न्यायाधीश के पद के पूर्व न्यायिक अधिकारियों को उपलब्ध कराएं, जो लंबित दावों की समीक्षा सकें।

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राज्य के रुख पर एससी ने जताई निराशा

राज्य की ओर से कपिल सिब्बल और मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि ग्रुप बी अधिकारी उपलब्ध कराए गए है। वहीं, ईसीआई की ओर से दामा शेषाद्रि नायडू ने कहा कि ऐसे एसडीएम रैंक अधिकारी, जो अर्द्ध-न्यायिक आदेश पारित कर सके, उपलब्ध नहीं कराए गए। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के रुख पर निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि ईआरओ के रूप में कार्य करने के लिए अधिकारियों की आवश्यकता है। चीफ जस्टिस ने कहा कि वे ईआऱओ के रूप में अधिकारी मांग रहे है। हमे राज्य से सहयोग की अपेक्षा थी। सीनियर वकील श्याम दीवान पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पेश हुए और कहा कि माइक्रो-ऑब्जर्वर को आदेश पारित करने से रोके जाने के बाद, ईसीआई ने स्पेशल रोल ऑब्जर्वर नामक एक नई श्रेणी के अधिकारी नियुक्त कर दिए है, जो ईआरओ द्वारा पारित आदेशों की व्यापक समीक्षा कर रहे है। उन्होंने कहा कि स्पेशल रोल ऑब्जर्वर ईआरओ पर हावी नहीं हो सकते। वे किस आधार पर सामूहिक रूप से ईआरओ के निर्णयों को अस्वीकार कर सकते है? चुनाव आयोग की ओर से नायडू ने इस दावे का खंडन किया और कहा कि स्पेशल रोल ऑब्जर्वर शुरुआत से ही नियुक्त थे।

कलकत्ता हाई कोर्ट को निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाई कोर्ट को निर्देश दिया है कि जिला जज या अतिरिक्त जिला जल स्तर के वर्तमान और पूर्व न्यायिक अधिकारियों को निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी के रूप में नियुक्त किया जाए। इस कदम का उद्देश्य है कि लंबित दावों और आपत्तियों का निष्पक्ष व पारदर्शी निपटारा हो सके। इसी वजह से शीर्ष अदालत को नई व्यवस्था अपनानी पड़ी। आंकड़े बताते हैं कि करीब 5 लाख नाम अब तक खारिज किए जा चुके हैं, जबकि लगभग 5 लाख लोग सुनवाई में शामिल नहीं हुए। करीब 55 लाख नाम अब भी विभिन्न स्तरों पर सत्यापन के लिए लंबित हैं। कुल मिलाकर करीब 70 लाख लोग वोटर लिस्ट से हटाए जा सकते हैं। 28 फरवरी को फाइनल लिस्ट जारी की जानी है।


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