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गेमिंग की गिरफ्त में बचपन:डॉक्टर बोले- फ्री फायर और कॉल ऑफ ड्यूटी जैसे गेम्स से बच्चों का दिमाग हो रहा ‘हाइजैक’

आजकल बच्चों के हाथों में बैट-बॉल या खिलौनों की जगह मोबाइल फोन ने ले ली है। सुनने में यह सामान्य लग सकता है, लेकिन यह बदलाव बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरे की घंटी बन रहा है। कानपुर के हैलेट अस्पताल की ओपीडी में आने वाले मामलों ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। यहाँ पहुँचने वाले करीब 70 प्रतिशत किशोर ‘फ्री फायर’ और ‘कॉल ऑफ ड्यूटी’ जैसे युद्ध वाले गेम्स की लत के शिकार हैं। यह खेल न केवल बच्चों का समय छीन रहे हैं, बल्कि उनके सोचने-समझने के तरीके को भी पूरी तरह बदल रहे हैं, जिसे डॉक्टर ‘ब्रेन हाइजैक’ होना कह रहे हैं। आभासी दुनिया को सच मान बैठते हैं मासूम एलएलआर अस्पताल के मनोरोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ.धनंजय पाण्डेय ने बताया कि,13 से 15 साल की उम्र के बच्चों का दिमाग पूरी तरह विकसित नहीं होता है। इस उम्र में जब वे घंटों तक कॉल ऑफ ड्यूटी या फ्री फायर जैसे गेम्स खेलते हैं, तो उनमें ‘लो फ्रस्ट्रेशन टोलरेंस’ यानी धैर्य की कमी और गुस्सा बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। इन गेम्स में मौजूद हिंसक कंटेंट (मार-काट) की वजह से बच्चे समाज से कट जाते हैं और सोशलाइज होना बंद कर देते हैं। वे अपनी एक अलग आभासी दुनिया बना लेते हैं और उसी को सच मानने लगते हैं। उनकी सोच नकारात्मक हो जाती है और वे सही-गलत का फर्क करने की क्षमता खो देते हैं। दो चौंकाने वाली केस स्टडी: जब मौत की धमकी देने लगे बच्चे हैलेट ओपीडी में हाल ही में दो ऐसे मामले सामने आए जिसने डॉक्टरों और अभिभावकों को झकझोर कर रख दिया है: केस 1: आवास विकास का किशोर आवास विकास का रहने वाला एक 14 वर्षीय छात्र रात-रात भर जागकर मोबाइल गेम्स खेलता था। जब माता-पिता ने उसका फोन छीनने की कोशिश की, तो उसने खुद को नुकसान पहुँचाने और आत्महत्या करने की धमकी दे डाली। बच्चा इतना आक्रामक हो गया था कि घर वालों को डर के मारे उसे दोबारा फोन देना पड़ा। केस 2: किदवई नगर का मामला
किदवई नगर के एक 13-15 साल के बच्चे में भी इसी तरह के लक्षण दिखे। वह रात के दो-तीन बजे तक गेम खेलता रहता था। नींद पूरी न होने और गेम के तनाव की वजह से वह चिड़चिड़ा रहने लगा। माता-पिता की रोक-टोक पर वह मरने-मारने पर उतारू हो जाता था। इन दोनों बच्चों का इलाज अब हैलेट में चल रहा है। कैसे हो रहा है सुधार: दवा और थैरेपी का सहारा
एलएलआर अस्पताल के मनोरोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ.धनंजय पाण्डेय ने बताया कि ,इन गंभीर मामलों में हम ‘कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी’ (CBT) का सहारा ले रहे हैं। इसके जरिए बच्चों के सोचने के तरीके और उनके व्यवहार में बदलाव लाने की कोशिश की जाती है। कुछ मामलों में थेरेपी के साथ-साथ दवाइयों की भी मदद ली जा रही है ताकि उनके दिमाग में बढ़ रही आक्रामकता को नियंत्रित किया जा सके। अभिभावकों के लिए डॉक्टरी सलाह
एलएलआर अस्पताल के मनोरोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ.धनंजय पाण्डेय ने बताया कि, बच्चों को इस दलदल से बाहर निकालने के लिए सिर्फ डांट-फटकार काम नहीं आएगी। सबसे पहले उनका स्क्रीन टाइम सीमित करना होगा। माता-पिता को बच्चों का बॉस बनने के बजाय उनका दोस्त बनना होगा। उन्हें गेमिंग के नकारात्मक और सकारात्मक पहलुओं को प्यार से समझाना होगा। जब बच्चा अपने माता-पिता में एक दोस्त देखेगा, तभी वह अपनी समस्याओं को साझा करेगा और इस आभासी दुनिया के चंगुल से बाहर निकल पाएगा।


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