लखनऊ में गुरुवार को आवारा कुत्तों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देशों के विरोध में पशु प्रेमियों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया। महानगर क्षेत्र में आयोजित इस विरोध प्रदर्शन में आसरा द हेल्पिंग हैंड्स और पॉसम फाउंडेशन जैसी पशु कल्याण संस्थाओं के साथ कई पशु अधिकार कार्यकर्ता शामिल हुए। प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य कुत्तों को सार्वजनिक स्थानों से हटाकर पाउंड और शेल्टर में रखने के निर्देशों पर आपत्ति जताना था। प्रदर्शन में शामिल कार्यकर्ताओं, जिनमें चारु खरे, अनु बोस, विशाखा चटर्जी, राहुल वर्मा, अलवीना, पूर्णा खरे और सोमिल श्रीवास्तव शामिल थे, ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर सुनवाई जारी है। उन्होंने तर्क दिया कि कुत्तों को पाउंड में बंद करना न तो व्यावहारिक, वैज्ञानिक और न ही मानवीय समाधान है। उनके अनुसार, यह समस्या को सुलझाने के बजाय और जटिल कर सकता है। नियमों को सख्ती से लागू करने की मांग की कार्यकर्ताओं ने यह भी कहा कि पाउंड और शेल्टर कुत्तों की आबादी नियंत्रित करने या आमजन की सुरक्षा सुनिश्चित करने का स्थायी तरीका नहीं हैं। उन्होंने सरकार से एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियमों को सख्ती से लागू करने की मांग की, जिसे वे कानूनी और वैज्ञानिक रूप से प्रभावी पद्धति मानते हैं। नसबंदी और टीकाकरण के बाद ये जानवर समाज के लिए अधिक सुरक्षित हो जाते हैं प्रदर्शनकारियों ने फीडिंग के वैज्ञानिक पहलुओं पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि नियमित और नियंत्रित भोजन मिलने से कुत्ते अपने क्षेत्र में स्थिर रहते हैं, जिससे उनकी आक्रामकता कम होती है और कूड़ा फैलाने की प्रवृत्ति भी घटती है। नसबंदी और टीकाकरण के बाद ये जानवर समाज के लिए अधिक सुरक्षित हो जाते हैं, जबकि भूखे जानवर तनावग्रस्त होकर हिंसक हो सकते हैं। आसरा द हेल्पिंग हैंड्स की चारु खरे ने कहा कि कुत्तों को पाउंड में रखना समस्या का समाधान नहीं है। उनके अनुसार, नसबंदी, टीकाकरण और सह-अस्तित्व ही मानवीय रास्ता है। अनु बोस ने मौजूदा पशु कल्याण कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया। पॉसम फाउंडेशन की विशाखा चटर्जी ने पाउंड व्यवस्था को दिखावटी बताते हुए इससे बीमारियाँ फैलने की आशंका व्यक्त की।
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