मानव इतिहास को समझने के लिए दुनिया की अब तक की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय शोध परियोजना शुरू होने जा रही है, जिसमें भारत से काशी हिंदू विश्वविद्यालय की अहम भागीदारी होगी। यह परियोजना यह बताएगी कि आज से करीब 3 लाख साल पहले अफ्रीका में जन्म लेने वाला मानव कैसे पूरी दुनिया में फैला और इस दौरान उसे किन-किन महामारियों और बीमारियों का सामना करना पड़ा। इस में शामिल वैज्ञानिक ज्ञानेश्वर बताते हैं कि उस समय न तो एंटीबायोटिक थीं और न ही वैक्सीन। जब-जब महामारियां आईं, बड़ी संख्या में लोग मारे गए। केवल वही लोग जीवित बचे जिनके शरीर में बीमारी से लड़ने वाले खास जेनेटिक बदलाव (म्यूटेशन) मौजूद थे। वैज्ञानिक अब यह जानना चाहते हैं कि ये बदलाव कब और कैसे हुए, और उनका असर आज के मानव पर क्या है। यह परियोजना 10 साल तक चलेगी और इसकी कुल लागत लगभग 85 मिलियन ऑस्ट्रेलियन डॉलर (करीब 700 करोड़ रुपये) है। इस रिसर्च में 22 से अधिक देशों के 50 से ज्यादा वैज्ञानिकशामिल हैं। अब जानिए क्यों पड़ी रिसर्च की आवश्यकता और क्या होगा
मानव अफ्रीका से निकलकर विश्वभर में कैसे फैला? बिना एंटीबायोटिक्स/वैक्सीन के महामारियों (वायरस, बैक्टीरिया आदि) से कैसे बचा? जीनोम में दर्ज पैथोजेन इंटरैक्शन की जानकारी कैसे निकाली जाए? क्यों केवल होमो सेपियंस ही बचा? पर्यावरणीय परिवर्तनों से अनुकूलन, इकोसिस्टम पर प्रभाव, नई वैज्ञानिक मॉडल, शिक्षा और नीतियां विकसित करना। भारतीय उपमहाद्वीप की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी गई है। अब जानिए कैसे आगे बढ़ेगा प्रोजेक्ट
ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी को इस अध्ययन के लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित करने के लिए ऑस्ट्रेलियन रिसर्च काउंसिल ने 35 मिलियन डॉलर की फेडरल फंडिंग दी है। पार्टनर यूनिवर्सिटी और संगठनों की तरफ से अतिरिक्त 50 मिलियन डॉलर के साथ कुल निवेश 85 मिलियन डॉलर (539 करोड़) हो गया है। बीएचयू के जूलॉजी विभाग के प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे इस सेंटर में पार्टनर इन्वेस्टिगेटर के तौर पर काम करेंगे। पॉपुलेशन जेनेटिक्स, प्राचीन डीएनए और दक्षिण एशियाई आबादी के डेमोग्राफिक इतिहास की उनकी विशेषज्ञता इस प्रोजेक्ट के लिए महत्वपूर्ण होगी। 20 से अधिक देश मिलकर करेंगे काम
शोध के मुख्य प्रबंधक ग्रिफिथ विश्वविद्यालय के प्रो. माइकल पेट्राग्लिया ने भारतीय उपमहाद्वीप के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि इसने पुरानी दुनिया की आबादी को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि बीएचयू और अन्य भागीदारों के साथ यह सहयोग मानव यात्रा को अधिक विस्तार से जानने में बहुत उपयोगी होगा। इस शोध परियोजना में भारत का प्रतिनिधित्व बीएचयू और अन्ना विश्वविद्यालय चेन्नई कर रहे हैं। इनके अलावा ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, केन्या, सऊदी अरब, चीन, इंडोनेशिया, श्रीलंका, यूरोप, यूके और कई स्वदेशी संगठनों के प्रमुख संस्थान भी शामिल हैं। अब जानिए प्वाइंट में क्या होगा खास • मानव के 3 लाख साल के इतिहास का पता चलेगा। • 700 करोड़ की परियोजना पहली बार बीएचयू को मिली,जो विश्व की सबसे बड़ी योजना है। • इससे दो तरह का लाभ होगा जिसमें पर्यावरण चुनौती और बीमारियों का पता लगाया जा सकेगा और भारतीय छात्रों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर बड़ा शोध करने का मौका मिलेगा। • बीएचयू में बनेगी भारत की अत्याधुनिक जीनोमिक लैब। • विश्व के 50 वैज्ञानिक और 23 देश 10 साल करेंगे रिसर्च
https://ift.tt/9Htli2w
🔗 Source:
Visit Original Article
📰 Curated by:
DNI News Live

Leave a Reply