सिल्क एक्सपो में लगे रेशम स्टॉल पर उत्तर प्रदेश में होने वाले रेशम उत्पादन की पूरी प्रक्रिया को विस्तार से प्रस्तुत किया गया। स्टॉल प्रभारी रईस आज़ाद ने बताया कि प्रदेश में मुख्य रूप से तीन प्रकार के रेशम पाए जाते हैं मलबरी, ऑरेंजी और तसर रेशम। मलबरी रेशम का कीड़ा शहतूत की पत्तियां खाता है, ऑरेंजी रेशम का कीड़ा रड़ की पत्ती पर पलता है, जबकि तसर रेशम अर्जुन वृक्ष की पत्तियों पर निर्भर करता है। अंडे से लार्वा और लार्वा से रेशम तक का सफर रईस आज़ाद के मुताबिक शहतूत रेशम का कीड़ा अंडे से निकलता है। ये अंडे दो तरह से तैयार किए जाते हैं लूज प्रक्रिया और सीड प्रक्रिया से। फीमेल तितलियों को विशेष सतह पर रखकर अंडे दिलवाए जाते हैं, जिन्हें नियंत्रित तापमान में सुरक्षित रखा जाता है। अंडों से लार्वा निकलने के बाद उन्हें नेट से ढककर शहतूत की पत्तियां दी जाती हैं, ताकि कीड़े आराम से भोजन कर सकें। 28 से 30 दिन में कीड़ा तैयार करता है हजार मीटर तक धागा लगभग 28 से 30 दिन तक शहतूत की पत्तियां खाने के बाद जब कीड़ा पूरी तरह मैच्योर हो जाता है, तो उसे माउंटेन में रखा जाता है। इसके बाद कीड़ा बिना कुछ खाए-पिए अपने मुंह से धागा निकालना शुरू करता है। हवा के संपर्क में आते ही यह धागा रेशम का रूप ले लेता है। एक कीड़ा करीब 1000 मीटर तक रेशमी धागा तैयार करता है। कोया से धागा और फिर बाजार तक पहुंच रेशम बनने के बाद कीड़ों को 5 से 6 दिन तक नेट के भीतर रखा जाता है। इसके बाद कोया को सन ड्राई किया जाता है और फिर बॉयलिंग की प्रक्रिया से गुजारा जाता है। इसके बाद मशीनों की मदद से धागों की रीलिंग होती है और तैयार रेशम बाजार में भेजा जाता है। प्रदेश में 350 मीट्रिक टन तक पहुंचा उत्पादन फिलहाल उत्तर प्रदेश में लगभग 300 से 350 मीट्रिक टन रेशम उत्पादन हो रहा है। सरकार का लक्ष्य इसे लगातार बढ़ाने का है। इसके लिए किसानों को प्रशिक्षण देकर रेशम उत्पादन से जोड़ा जा रहा है, ताकि उन्हें अतिरिक्त आय के अवसर मिल सकें। केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के तहत अनुदान, तकनीकी सहायता और ट्रेनिंग उपलब्ध कराई जा रही है। ‘सॉइल टू सिल्क’ मॉडल से शुद्ध रेशम की पहचान पर फोकस सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में ‘सॉइल टू सिल्क’ की पूरी प्रक्रिया नर्सरी विकास, शहतूत रोपण, रेशम कीट पालन, कोया उत्पादन, धागाकरण और अंत में साड़ी व परिधान निर्माण का चरणबद्ध और व्यावहारिक प्रदर्शन किया जाएगा। इसका उद्देश्य लोगों को शुद्ध रेशम की पहचान और नकली या मिश्रित रेशम से फर्क समझाना है। बुनकरों और किसानों को मिलेगा सीधा बाजार यह केंद्र प्रशिक्षण और जागरूकता के साथ-साथ एक्जीबिशन और मार्केटिंग कम सेल सेंटर के रूप में भी काम करेगा। यहां शुद्ध रेशमी वस्त्रों और परिधानों की सीधी बिक्री होगी, जिससे स्थानीय बुनकरों, कारीगरों, किसानों और स्वयं सहायता समूहों को प्रत्यक्ष बाजार मिलेगा।
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