कानपुर के ग्रीन पार्क स्टेडियम के पिच क्यूरेटर शिवकुमार की हार्ट अटैक से मौत हो गई। मंगलवार को वह पिच पर काम कर रहे थे, तभी वह नीचे गिर पड़े। स्टाफ उन्हें अस्पताल लेकर पहुंचा। वहां उनकी मौत हो गई। शिवकुमार देशभर के कई स्टेडियम की पिचों के लिए काम कर चुके थे। ग्रीन पार्क की पिच को वह लाल मिट्टी से बनाना चाहते थे। यह उनका सपना भी था। शिवकुमार ने दो साल पहले तय किया था कि वह लाल मिट्टी की पिच अपने हाथों से बनाएंगे। इसके लिए उन्होंने करीब 20 दिन पहले ही मुंबई से लाल मिट्टी मंगवा ली थी। वह ग्रीन पार्क स्टेडियम में ही रखी हुई है। हाल ही में ग्रीनपार्क में कर्नल सीके नायडू ट्रॉफी के मैच होने हैं। इसलिए शिवकुमार उसी के लिए पिच पर काम कर रहे थे। इसके बाद वह ग्रीन पार्क की पिच को लाल मिट्टी से बनाने की योजना बना रहे थे। शिवकुमार लाल मिट्टी की पिच क्यों बनाना चाहते थे? इस पिच की खासियत क्या है? पढ़िए रिपोर्ट… अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों के लिए तैयार की पिच बरेली के रहने वाले शिव कुमार यादव ने एक इलेक्ट्रीशियन के तौर पर खेल विभाग में नौकरी ज्वाइन की थी। उन्हें अक्टूबर 2000 में प्रयागराज से कानपुर के ग्रीन पार्क स्टेडियम में लाइटिंग अरेंजमेंट करने के लिए बुलाया गया था। उस दौरान पिच को लेकर उनकी BCCI की पिच कमेटी के सदस्य और ग्रीन पार्क के संरक्षक आनंद शुक्ला से बात हुई थी। तब आनंद शुक्ला ने शिवकुमार को ग्रीन पार्क के ग्राउंड संभालने का जिम्मा सौंप दिया। इसके बाद उन्होंने बीसीसीआई की परीक्षा उत्तीर्ण की। फिर वह सीनियर पिच क्यूरेटर और सेंट्रल जोन प्रभारी बने। उन्होंने ग्रीन पार्क में 2005 से अब तक खेले गए सभी अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों के लिए विकेट तैयार की। भारत का 500वां टेस्ट हो या आईपीएल, हर बड़े आयोजन में उनकी बनाई पिचों की सराहना हुई। राहुल द्रविड़, सचिन तेंदुलकर, महेंद्र सिंह धोनी, विराट कोहली और रोहित शर्मा जैसे दिग्गज खिलाड़ी भी उनके कार्य की खुले मंच से प्रशंसा कर चुके हैं। लाल मिट्टी से पिच क्यों बनाना चाहते थे शिवकुमार, वो पढ़िए- शिवकुमार चाहते थे कि हमारे बल्लेबाज तेज पिचों पर बेहतरीन बल्लेबाज़ी कर सकें। इसके अलावा हमारे गेंदबाज तेज पिचों पर अच्छे उछाल का फायदा उठा सकें। इसके लिए वह काम कर रहे थे। पिच एक्सपर्ट बताते हैं कि काली मिट्टी की पिच में उछाल कम होता है, जबकि लाल मिट्टी की पिच में गेंदबाजों को ज्यादा उछाल मिलता है। क्योंकि कानपुर सहित उत्तर भारत में अधिकतर पिचें काली मिट्टी की बनी हैं। इसकी वजह से जब हमारे खिलाड़ी बाहर खेलने जाते थे, तो उन्हें लाल मिट्टी की उछाल भरी पिचों पर खेलना पड़ता था।
लाल मिट्टी की पिच देश के दक्षिण और पश्चिमी क्षेत्रों में पाई जाती है। इसलिए शिवकुमार चाहते थे कि तेज उछाल भरी पिचों पर हमारे खिलाड़ी बेहतर प्रदर्शन कर सकें। अभी ग्रीनपार्क में काली मिट्टी की 9 पिच बनी हैं। इसके अलावा 6 अभ्यास पिच बनी हैं। लाल मिट्टी की पिच बनने से अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी भी तैयार हो सकेंगे।
ज्ञानेन्द्र पांडेय ने बताया- शिवकुमार मददगार इंसान थे
शिवकुमार के बेहद करीबी उनके दोस्त पूर्व भारतीय खिलाड़ी ज्ञानेन्द्र पांडेयने बताया कि मैं खुद इसी ग्रीन पार्क में आठ साल तक हॉस्टल में रहा हूं। शिवकुमार से मेरे बहुत अच्छे संबंध थे। क्योंकि वह यहां अकेले रहते थे, तो उनके साथ ज्यादा वक्त बीतता था। वह बहुत मददगार इंसान थे। उनकी हमेशा यही सोच रहती थी कि यहां सीखने वाला हर खिलाड़ी बेहतर खेल का प्रदर्शन करें।
भूपेंद्र बोले- शिवकुमार चाहते थे खिलाड़ियों को दिक्कत न हो
शिवकुमार के साथ पिच पर काम करने वाले भूपेंद्र सिंह ने बताया कि हम लोग 22 साल से साथ काम कर रहे थे। लाल मिट्टी की पिच शिवकुमार इसलिए बनाना चाहते थे, क्योंकि जब खिलाड़ी बाहर खेलने जाते थे, तो उन्हें दिक्कत होती थी।
हम लोगों ने योजना बनाई थी कि कर्नल सीके नायडू ट्रॉफी के बाद पिच जल्द बनाई जाएगी। पिच बनाने में 20 से 25 दिन का समय लगता है और उसके बाद उसे तैयार होने में करीब छह महीने लग जाते हैं। शिवकुमार के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता
यूपीसीए के नोडल अधिकारी सुरजीत श्रीवास्तव ने बताया कि दो दिन बाद कर्नल सीके नायडू ट्रॉफी के मैच होने हैं। यह हमारे लिए अपूरणीय क्षति है, जिसकी भरपाई कर पाना मुमकिन नहीं है। यह हमारे लिए बहुत ही दुखद पल है। उन्हें हमेशा याद रखा जाएगा। उनका जो योगदान रहा है, उसे ग्रीन पार्क और यूपीसीए कभी नहीं भूल सकता। शिवकुमार ने यूपीसीए को बीसीसीआई में प्रतिनिधित्व दिया। उनके परिवार के लिए जो भी संभव होगा, वह जरूर किया जाएगा।
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