उत्तर प्रदेश के कोटेदार (उचित दर विक्रेता) लाभांश और मानदेय बढ़ाने की मांग को लेकर लखनऊ के इको गार्डन में धरने पर बैठे हैं। आंदोलन का मंगलवार को पांचवां दिन रहा, लेकिन सरकार और कोटेदारों के बीच अब तक किसी ठोस समाधान पर सहमति नहीं बन सकी है। धरने पर मौजूद कोटेदारों का कहना है कि वे शासन के निर्देशों के अनुसार नियमित और पारदर्शी तरीके से राशन वितरण कर रहे हैं। कोरोना काल में भी प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत निःशुल्क राशन का वितरण ई-पॉस मशीन के माध्यम से किया गया, जिसकी देशभर में सराहना हुई। इसी बेहतर व्यवस्था के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को केंद्र सरकार की ओर से प्रशस्ति पत्र भी मिला। दूसरे राज्यों में दिया जा रहा ज्यादा लाभ कोटेदारों का आरोप है कि इतनी बड़ी जिम्मेदारी निभाने के बावजूद उन्हें केवल 90 रुपये प्रति कुंतल का लाभांश दिया जा रहा है, जो बेहद कम है। उन्होंने अन्य राज्यों का उदाहरण देते हुए कहा कि हरियाणा, गोवा और दिल्ली में 200 रुपये प्रति कुंतल लाभांश दिया जाता है, जबकि गुजरात में कोटेदारों के लिए 20 हजार रुपये न्यूनतम आय गारंटी की व्यवस्था है। बढ़ती महंगाई के बीच इतने कम लाभांश में परिवार चलाना मुश्किल हो गया है। कोटेदार बोले, आबादी के 80 प्रतिशत लोगों से सीधा संवाद प्रदेश अध्यक्ष राजेश त्रिपाठी ने धरने को संबोधित करते हुए कहा कि आंदोलन का पांचवां दिन हो चुका है, लेकिन सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई। उन्होंने सवाल उठाया कि जब प्रदेश में राशन वितरण व्यवस्था को सबसे बेहतर माना जा रहा है, तो फिर कोटेदारों को सबसे कम कमीशन क्यों दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि कोटेदार गांव की करीब 80 प्रतिशत आबादी से सीधे जुड़े होते हैं। किसी भी संकट की स्थिति में सबसे पहले कोटेदार ही लोगों की मदद के लिए आगे आता है। हम सरकार और जनता के बीच सेतु की तरह काम करते हैं। यदि हमारी मांगों को नजरअंदाज किया गया तो इसका असर 2027 के विधानसभा चुनाव में दिखाई देगा। प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष गिरीश तिवारी ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर जल्द ही मांगों पर फैसला नहीं लिया गया तो कोटेदार विधानसभा का घेराव करेंगे। साथ ही राशन वितरण भी ठप किया जा सकता है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी।
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