सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम मौलवी पर कथित हमले के मामले में यूपी सरकार उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि केवल जांच अधिकारी (IO) के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू कर देना, उचित कानूनी धाराओं में एफआईआर दर्ज न करने का विकल्प नहीं हो सकता। न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने स्पष्ट शब्दों में टिप्पणी करते हुए कहा,“Enquiry proceedings against IO not the answer to non-registration of FIR under appropriate provisions.” 2021 में मुस्लिम पहचान के आधार पर हमले का आरोप
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ दिल्ली निवासी काज़ीम अहमद शेरवानी की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता का आरोप है कि साल 2021 में उनकी मुस्लिम पहचान के कारण एक समूह ने उन पर हमला किया था। याचिका में निष्पक्ष जांच कराने और शिकायत दर्ज न करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है। हेट क्राइम से जुड़ी धाराएं शामिल न करने पर आपत्ति
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हुज़ैफ़ा अहमदी ने अदालत को बताया कि यह कोई एकल घटना नहीं है, बल्कि ऐसे मामलों में प्रशासन की अनिच्छा बार-बार देखने को मिलती है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद भले ही एफआईआर दर्ज की गई, लेकिन उसमें हेट क्राइम से संबंधित आईपीसी की महत्वपूर्ण धाराएं, धारा 153B और 295A शामिल नहीं की गईं। धारा 196 CRPC और सरकारी मंजूरी का सवाल
अहमदी ने दलील दी कि आरोपों के आधार पर ये धाराएं स्पष्ट रूप से लागू होती हैं। इस पर जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि इन धाराओं में संज्ञान लेने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 196 के तहत सरकारी मंजूरी आवश्यक होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक उचित धाराओं में एफआईआर दर्ज नहीं होगी, तब तक मंजूरी और आगे की जांच की प्रक्रिया संभव नहीं है। विभागीय कार्रवाई पर कोर्ट की तीखी टिप्पणी
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने अदालत को बताया कि यह जांच अधिकारी की गलती थी और उसके खिलाफ विभागीय जांच शुरू कर दी गई है। इस पर जस्टिस मेहता ने तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा, “क्या विभागीय कार्रवाई से एफआईआर की कमी पूरी हो जाती है?” उन्होंने कहा कि उचित धाराओं में एफआईआर दर्ज किए बिना जांच और मंजूरी की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकती। FIR दर्ज करने से इनकार नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
अदालत ने यह भी सवाल किया कि यदि सरकारी मंजूरी देने से इनकार किया जा सकता है, तो क्या एफआईआर दर्ज करने से भी इनकार किया जा सकता है? इस पर एएसजी ने स्वीकार किया कि एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए थी। कोर्ट ने राज्य सरकार को एक सप्ताह का समय दिया है ताकि वह इस मुद्दे पर निर्देश लेकर अदालत के समक्ष पेश हो सके। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को देशभर में हो रही घटनाओं से जोड़ने से इनकार कर दिया। जस्टिस मेहता ने कहा कि यह एक व्यक्तिगत मामला है और राष्ट्रीय स्तर पर कोई निष्कर्ष निकालने के लिए अदालत के समक्ष ठोस आंकड़े मौजूद नहीं हैं।
क्या था मामला
दिल्ली निवासी काजिम अहमद शेरवानी ने याचिका में बताया कि 4 जुलाई, 2021 को जब वह नोएडा से कार से अलीगढ़ के लिए रवाना हुआ, रास्ते में अपराधियों के एक ‘पेचकश गिरोह’ ने उस पर हमला किया। धर्म के आधार पर उसके साथ मारपीट की और दुर्व्यवहार किया। उसने जब पुलिस में शिकायत दी तो घृणा अपराध में मामला दर्ज करने के बजाय पुलिस ने भी उसे परेशान किया।
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