लखनऊ स्थित बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (बीएसआईपी) में ‘रॉक मैग्नेटिज़्म इन अर्थ साइंसेज़ (RMES-2026)’ विषय पर तीन दिवसीय क्षमता निर्माण कार्यशाला शुरू हो गई है। इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य भूविज्ञान एवं पृथ्वी विज्ञान से जुड़े छात्रों, शोधार्थियों और शिक्षकों को रॉक मैग्नेटिज़्म की आधुनिक तकनीकों तथा उनके व्यावहारिक उपयोगों से परिचित कराना है। रॉक मैग्नेटिज़्म चट्टानों और मिट्टी में मौजूद चुंबकीय गुणों का अध्ययन है। यह पृथ्वी के प्राचीन चुंबकीय क्षेत्र, जलवायु परिवर्तन, भूगर्भीय प्रक्रियाओं और पर्यावरणीय बदलावों को समझने में सहायक है। इस क्षेत्र में हो रहे तीव्र तकनीकी विकास को देखते हुए, कार्यशाला में प्रतिभागियों को नवीन ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक प्रशिक्षण भी प्रदान किया जा रहा है। संस्थान की आधुनिक प्रयोगशालाओं के बारे में जानकारी दी कार्यशाला का उद्घाटन दीप प्रज्वलन और सरस्वती वंदना के साथ हुआ। उद्घाटन सत्र में संयोजक डॉ. मोहम्मद आरिफ, वैज्ञानिक-डी ने बीएसआईपी के गौरवशाली इतिहास और संस्थान की आधुनिक प्रयोगशालाओं के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि रॉक मैग्नेटिज़्म का उपयोग पुराचुंबकत्व, भूस्तरीय दिनांकन, प्लेट विवर्तनिकी और पुराजलवायु अध्ययनों में व्यापक रूप से किया जाता है। सह-संयोजक डॉ. बिनिता फर्तियाल, वैज्ञानिक-एफ ने बताया कि बीएसआईपी की पुराचुंबकत्व प्रयोगशाला अब एक प्रमुख राष्ट्रीय सुविधा के रूप में कार्य कर रही है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि ‘एप्लीकेशन एंड एडवांस इन पैलेयो रॉक एंड एनवायरनमेंट मैग्नेटिज़्म’ विषय पर इस प्रकार की क्षमता निर्माण कार्यशाला पहली बार आयोजित की गई है, जिसमें क्षेत्र से नमूना संग्रह, प्रयोगशाला तैयारी और आधुनिक विश्लेषण तकनीकों का प्रशिक्षण शामिल हैं। बुनियादी समझ विकसित करने का बेहतर अवसर हैं बीएसआईपी के निदेशक प्रो. एम.जी.ठक्कर ने कहा कि यह कार्यशाला छात्रों और युवा शोधकर्ताओं के लिए रॉक मैग्नेटिज़्म और पुराचुंबकत्व की बुनियादी समझ विकसित करने का एक बेहतर अवसर है। उन्होंने बताया कि पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का उपयोग पक्षी दिशा-निर्धारण में करते हैं, जिसे मैग्नेटोरिसेप्शन कहा जाता है। मुख्य अतिथि प्रो. अशोक सहनी, एमेरिटस प्रोफेसर, पंजाब विश्वविद्यालय ने अपने शोध अनुभव साझा करते हुए बताया कि पुराचुंबकीय अध्ययनों ने दक्कन इंटरट्रेपियन शैलक्रमों की आयु निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सम्मानित अतिथि प्रो. टी. राधाकृष्णा ने इस क्षेत्र में और अधिक प्रयोगशालाओं की आवश्यकता पर जोर दिया।
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