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सरकारी नौकरी छोड़ सहजन की कंपनी बनाई:मोदी खाते हैं हफ्ते में 2 पराठे; लखनऊ की डॉ. कामिनी ने मोरिंगा आर्मी बनाई

एक ओर युवा सरकारी नौकरी की ओर दौड़ लगा रहे हैं। दूसरी ओर एक ऐसी महिला भी हैं, जिन्होंने प्रतिष्ठित सरकारी नौकरी को छोड़कर अपना अलग रास्ता चुना। अपने दम पर न सिर्फ पहचान बनाई, बल्कि दूसरों के लिए भी प्रेरणा बन गईं। 8 साल में एक हजार महिलाओं की मोरिंगा आर्मी खड़ी की। उनका अब हर साल ढाई करोड़ का टर्नओवर है। सक्सेस मिली तो पीएम नरेंद्र मोदी ने अक्टूबर, 2025 में मिलने बुलाया। पीएम मोदी ने कहा- वो हफ्ते में दो बार मोरिंगा (सहजन) के पराठे खाते हैं। फिर क्या था, इंटरनेट पर मोरिंगा की पौष्टिकता तलाशी जाने लगी। यह कहानी है लखनऊ की डॉ. कामिनी सिंह की। आज कामिनी मोरिंगा से 18 से ज्यादा प्रोडक्ट तैयार करती हैं। दैनिक भास्कर ने डॉ. कामिनी सिंह से बातचीत की। आइए जानते हैं कि कैसे इन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर आर्गेनिक फार्मिंग को चुना? मोरिंगा यानी सहजन से क्या-क्या बनाती हैं? महिला किसानों को मोरिंगा खेती के लिए प्रेरित किया
डॉ. कामिनी सिंह ने एफपीओ (किसान उत्पादक संगठन) के जरिए 1000 से ज्यादा महिला किसानों को जोड़ा। उन्हें मोरिंगा की खेती के लिए प्रेरित किया। महिलाओं को मोरिंगा के वैल्यू एडिशन यानी उससे जुड़े प्रोडक्ट को बनाकर बाजार तक भी पहुंचाया। आज डॉ. कामिनी के साथ ज्यादातर महिलाएं ही काम करती हैं। ये महिलाएं सिर्फ खेती ही नहीं, प्रोसेसिंग और पैकेजिंग का काम भी खुद संभाल रही हैं।
यहां की महिलाएं आर्थिक तौर पर हो रहीं मजबूत
डॉ. कामिनी की बनाई गई कंपनी डॉ. मोरिंगा के साथ काम करने वाली महिलाएं आर्थिक तौर पर खुद को मजबूत मानती हैं। यहां पहुंचने के बाद हमें यहां काम करती हुई महिलाएं मिलीं। ये ग्रीन टी बनाने के लिए तुलसी तैयार कर रही थीं। तुलसी के बीजों को सुखाकर साफ कर रही थीं। यहां काम करने वाली वर्कर विन्धेश्वरी बताती हैं कि यहां के प्रोडक्ट बहुत अच्छे होते हैं। ये ना सिर्फ हेल्थ के लिए बेनेफिशियल होते हैं, बल्कि यहां काम करके हमारी आर्थिक स्थिति भी मजबूत होती है। मोरिंगा से बनाए जा रहे 18 से ज्यादा प्रोडक्ट
कामिनी सिंह ने बताया कि अभी महिलाओं के प्रयास से मोरिंगा से 18 से ज्यादा प्रोडक्ट तैयार हो रहे हैं। इनमें मोरिंगा पाउडर, टैबलेट, मोरिंगा टी, हैंडमेड साबुन, मोरिंगा सीड ऑयल, बिस्कुट, मोरिंगा के लड्‌डू, मोरिंगा के पेन ऑयल तैयार किए जाते हैं। ये उत्पाद स्थानीय बाजार से लेकर ऑनलाइन प्लेटफार्म पर भी उपलब्ध हैं और इनकी भारी मांग है। जानिए कौन हैं डॉ. कामिनी डॉ. कामिनी सिंह ने बनारस की गलियों में अपना बचपन बिताया, फिर लखनऊ का रुख किया। वह पहले सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर सबट्रॉपिकल हॉर्टिकल्चर (CISH) में सीनियर रिसर्चर के तौर पर काम करती थीं। दैनिक भास्कर से डॉ. कामिनी ने बताया कि उन्होंने करीब 7 साल तक सरकारी नौकरी की। फिर 2015 में नौकरी छोड़ दी। इसके बाद 2017 में अपना काम शुरू किया। किसानों के साथ मिलकर मोरिंगा यानी की सहजन प्रोजेक्ट पर काम करने लगीं। मोरिंगा को ही क्यों चुना?
डॉ. कामिनी सिंह के मुताबिक, मोरिंगा (सहजन) की खेती बेहद आसान है। यह पेड़ ज्यादातर जगहों पर मिल जाता है। लेकिन, बहुत कम लोगों को इसके फायदे पता हैं। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी खेती में केमिकल की जरूरत नहीं पड़ती। कम खर्च में अच्छी पैदावार मिल जाती है। इसी वजह से उन्होंने मोरिंगा को अपने प्रोजेक्ट के लिए चुना। हालांकि, शुरुआत में इसके लिए किसानों को तैयार करना आसान नहीं था। कामिनी बताती हैं कि ऑर्गेनिक खेती अपनाने के लिए किसानों को मनाना काफी मुश्किल होता है। लेकिन, जब धीरे-धीरे लोगों ने इसके फायदे समझे, तो किसान जुड़ने लगे। इसके बाद काम भी बढ़ता गया और किसानों की आय में भी सुधार होता गया। मोरिंगा के अलावा लेमन ग्रास और तुलसी से भी बनते हैं प्रोडक्ट
मोरिंगा के साथ-साथ लेमन ग्रास से भी कई तरह के प्रोडक्ट तैयार किए जाते हैं। इसके अलावा तुलसी के बीज और पत्तों से हर्बल टी बनाई जाती है, जिसकी बाजार में अच्छी मांग रहती है। कामिनी को यूं ही नहीं मिली सफलता
डॉ. कामिनी ने बिजनेस बढ़ाने के लिए काफी संघर्ष किया। साल 2018 में उन्होंने लखनऊ से थोड़ी दूरी पर सिधौली में 7 एकड़ की जमीन लीज पर ली और मोरिंगा की खेती की। हालांकि शुरुआत में कोई खरीदार नहीं मिला। उन्होंने फिर 9 लाख रुपए का लोन लिया और एक यूनिट स्थापित की। इससे डॉ. कामिनी ने मोरिंगा की पत्तियों को सुखाकर पाउडर बनाया। फिर धीरे-धीरे साबुन कैप्सूल और अन्य प्रोडक्ट बनाने शुरू किए। अब कॉमिनी सिंह का टर्नओवर 2.5 करोड़ से भी ज्यादा का है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पसंदीदा है मोरिंगा पराठा
सितंबर, 2020 में फिट इंडिया मूवमेंट की पहली वर्षगांठ के दौरान पीएम मोदी ने कई मशहूर हस्तियों से बातचीत की थी। इस दौरान उन्होंने बताया था कि उन्हें मोरिंगा (सहजन) के पराठे बेहद पसंद हैं। हफ्ते में वो दो बार इस पराठे को जरूर खाते हैं। दरअसल, मोरिंगा के पेड़ की पत्तियां, जड़ और फल पोषक तत्वों और विटामिन से भरपूर होते हैं। इसके गुणों की वजह से इसका इस्तेमाल एंटीऑक्सीडेंट, सूजन कम करने, डायबिटीज कंट्रोल और कैंसर से जुड़ी रिसर्च में भी किया जाता है। डॉ. कामिनी सिंह ने इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए इसे जैविक विकास कृषि संस्थान के रूप में जमीन पर उतारा और किसानों को इससे जोड़कर नई दिशा दी। मोरिंगा के ये प्रोडक्ट कहां मिलेंगे?
डॉ. कामिनी के अनुसार, मोरिंगा से बने ये प्रोडक्ट बाजार में कई दुकानों पर उपलब्ध हैं। इसके अलावा इन्हें अमेजन, फ्लिपकार्ट और डॉ. मोरिंगा की आधिकारिक वेबसाइट के जरिए भी खरीदा जा सकता है। मोरिंगा से तैयार उत्पादों की कीमत 75 रुपए से शुरू होकर 1000 रुपए तक है, जिससे ये हर वर्ग के लोगों के लिए सुलभ हैं। इसके अलावा मोरिंगा के फायदों को बताने के लिए जगह-जगह स्टॉल लगाए जाते हैं। मोरिंगा की खेती से बढ़ी किसानों की आय
डॉ. कामिनी के अनुसार, शुरुआत में किसानों को मोरिंगा की खेती के लिए तैयार करना एक बड़ी चुनौती थी। लेकिन, जब उन्हें इसके पोषण संबंधी फायदे, कम लागत और आसान खेती के तरीकों की जानकारी मिली, तो वे धीरे-धीरे इसके लिए राजी हो गए। आज मोरिंगा की खेती से किसानों की आय में करीब 40 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखी गई है। डॉ. मोरिंगा के साथ वर्तमान में 500 से अधिक महिलाएं जुड़ी हैं। इनमें से 30 से ज्यादा महिलाएं सैलरी पर काम कर रही हैं। कुछ महिलाएं कमीशन आधारित और डेली बेसिस पर काम करती हैं। अब डॉ. कामिनी के काम का मॉडल समझिए
डॉ. कामिनी सिंह कमर्शियल और सहकारिता दोनों मॉडल पर काम करती हैं। कामिनी ने एफपीओ के जरिए सैकड़ों-हजारों महिला किसानों को जोड़ा है। महिलाएं खुद मोरिंगा की खेती करती हैं। मोरिंगा से बने प्रोडक्ट मार्केट में बेचे जाते हैं। लेकिन मुनाफे का बड़ा हिस्सा महिला किसानों की आय बढ़ाने में जाता है। डॉ. मोरिंगा की धीरे-धीरे बन रही पहचान
डॉ. कामिनी के अनुसार, मोरिंगा से बने प्रोडक्ट की कुल बिक्री में करीब 30% हिस्सा ऑनलाइन और 70% ऑफलाइन आता है। इसके साथ ही सोशल मीडिया और वॉट्सऐप नेटवर्क के जरिए भी ऑर्डर लिए जाते हैं। वहीं, ऑफलाइन बिक्री स्थानीय रिटेल दुकानों, आयुर्वेदिक स्टोर्स, मेडिकल शॉप्स, कृषि मेलों, प्रदर्शनियों और एफपीओ नेटवर्क के जरिए होती है। महिला किसान खुद भी अपने एरिया में ये प्रोडक्ट बेचती हैं। जिससे जमीनी स्तर पर रोजगार और आय दोनों को मजबूती मिलती है। ————————– ये खबर भी पढ़ें… शिखा अपमान से यूपी भाजपा को कितना नुकसान, 5 चुनावों में सबसे ज्यादा ब्राह्मण वोट मिले, नाराज हुए तो किधर जाएंगे? यूपी में पहले समाज के सुख-दुख पर चर्चा के लिए एक साथ बैठे ब्राह्मण विधायकों को नोटिस दिया गया। फिर प्रयागराज के माघ मेले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का अपमान और उनके शिष्यों की चोटी (शिखा) खींचकर पिटाई की गई। दोनों मामलों से ब्राह्मण समाज गुस्से में है। इसके बाद भाजपा और सरकार निशाने पर है। पढ़िए पूरी खबर…


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