कुछ यात्राएं खूबसूरत तस्वीरें देती हैं, कुछ सिर्फ कहानियां। लेकिन कुछ ऐसी जिम्मेदारी सौंप देती हैं, जिसके लिए आप कभी तैयार नहीं होते। यह कहना है लंदन निवासी पर्वतारोही मंडालिन ‘क्रिस’ क्रिस्टेया का। क्रिस कहते हैं, मो ब्लां (आल्प्स) की वह बर्फीली और सबसे ऊंची चोटी- मेरे लिए शुरुआत में सिर्फ अधूरा सपना था। मैं नहीं जानता था कि वही सपना एक दिन मुझे दो अजनबियों की जिंदगी और अपनी किस्मत के बीच ढाल बनाकर खड़ा कर देगा। जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं, तो समझ आता है कि वह सिर्फ पहाड़ की चढ़ाई नहीं थी; मेरे चरित्र की परीक्षा भी थी। कैसे एक घटना ने जिंदगी को मकसद दे दिया, जानिए… मंगेतर से मजाक में लिया चैलेंज मैं लंदन के जिम में लाइफगार्ड था। जिंदगी नीरस लग रही थी। 2016 में बार्सिलोना में घूमते हुए मो ब्लां घड़ी की दुकान पर पहुंचा। घड़ियां बेहद खूबसूरत थीं, पर पहुंच से बाहर। मैंने मजाक में अपनी मंगेतर विव से कहा,‘अगर मैं मो ब्लां माउंटेन पर चढ़ जाऊं, तो छूट मिलेगी? बस तभी ठाना कि यूरोप की सबसे ऊंची चोटी मो ब्लां फतह करूंगा। बेयर ग्रिल्स से मिली प्रेरणा पर्वतारोहण का अनुभव नहीं था, बस बेयर ग्रिल्स की किताब से जुनून मिला। विव डरी हुई थी, पर मेरी जिद को देख उसने सहमति दे दी। कुछ महीने बाद ही मैं फ्रांस के शैमोनी पहुंचा। चढ़ाई शुरू कर दी। सुबह के तीन बजे होंगे… शिखर 180 मीटर ही दूर था, पर 15 हजार फीट पर मौसम अचानक बिगड़ गया। बर्फीली हवाएं इतनी तेज थीं कि मुझे संतुलन बनाए रखने के लिए बैठना पड़ा। वहीं मेरी मुलाकात जेम्स और उनके बेटे मैट से हुई। वे ब्रिटिश पर्वतारोही थे और नीचे उतर रहे थे। एक सेकेंड में सब बदल गया जेम्स ने कहा,‘ऊपर जाना पागलपन है, हालात बदतर होते जा रहे हैं।’ मैंने साथ नीचे उतरने का फैसला किया। हम तीन लोग थे, सब कुछ नियंत्रण में लग रहा था… और फिर… एक सेकेंड में सब बदल गया। अचानक भयानक मंजर दिखा। हवा की रफ्तार 80 किमी रही होगी। जेम्स का पैर फिसला और वह पेट के बल नीचे की ओर फिसलने लगे। वह बेटे मैट से रस्सी के जरिए बंधे थे। अगर जेम्स खाई में गिरते, तो बेटे को भी साथ खींच ले जाते। मैं जड़ हो गया। सबसे खतरनाक पल ऊंचाई पर डर चीखता नहीं, बस आपको स्थिर कर देता है। और वही सबसे खतरनाक पल था। मैं कुछ सेकेंड तक हिला नहीं। हवा आवाजें निगल रही थी। कोई गाइड नहीं था, कोई मदद नहीं। दिमाग में सिर्फ एक ही बात थी- यह आदमी मरने वाला है… और शायद उसी पल मेरे भीतर कुछ टूट गया… या जाग गया। मैं सुन्न रह गया। मेरी रीढ़ की हड्डी में डर की एक लहर दौड़ गई। लगा कि वे दोनों मर जाएंगे। लगा कि दाहिनी बाजू उखड़ जाएगी लेकिन अगले ही पल, न जाने कहां से हिम्मत आई। मैंने हवा में छलांग लगाई और उस रस्सी को पकड़ लिया जो जेम्स को नीचे खींच रही थी। मैं बर्फ पर पेट के बल गिरा, कुल्हाड़ी (आइस एक्स) को पूरी ताकत से बर्फ में गाड़ दिया और अपने जूतों के स्पाइक्स को जमीन में धंसा दिया। तभी एक जोरदार झटका महसूस हुआ। मेरी दाहिनी बाजू मानो उखड़ गई हो, पर मैंने पकड़ ढीली नहीं की। आंखें खोलीं, तो जेम्स मुझसे 10 मीटर नीचे ढलान पर टिके थे। नीचे हजारों फीट गहरी खाई ठीक नीचे हजारों फीट गहरी खाई थी। मैट के चेहरे पर मौत का खौफ साफ दिख रहा था। तभी कुछ और पर्वतारोही वहां पहुंचे। हमने मिलकर जेम्स को ऊपर खींचा। जेम्स सुरक्षित थे, पर पूरी तरह टूट गए थे। पूरी रात वे पहाड़ की तरफ पीठ करके बैठे रहे, मानो उसे देखना भी नहीं चाहते। मेरा हाथ थामकर कहा, ‘जान बचाने के लिए शुक्रिया।’इस घटना ने जिंदगी बदल दी। मैंने महसूस किया कि पर्वतारोहण ही असली जुनून है। 2018 में फिर मो ब्लां लौटा। पूरी तैयारी के साथ… सनस्क्रीन, इलेक्ट्रोलाइट्स, ट्रेनिंग और दो साथी पर्वतारोही। चोटी पर पहुंचकर सपना पूरा किया मैंने सफलतापूर्वक चोटी पर पहुंचकर अपना सपना पूरा किया। पत्नी विव और मैं, दोनों मिलकर दुनियाभर की चोटियां चढ़ चुके हैं। आज भी जेम्स व मैट से जुड़ा हूं। जेम्स ने दोबारा पर्वतारोहण नहीं किया। वह कहते हैं,‘उस दिन के बाद हर दिन उनके लिए बोनस है।’ हालांकि जब उस दिन को याद करता हूं, तो लगता है जैसे मैंने उनकी नहीं, उन्होंने मेरी जान बचाई। मैं अब बदल हुआ इंसान मो ब्लां आज भी वहीं है- उतना ही जादुई, उतना ही निर्दयी। पर मैं बदल गया हूं। दो साल बाद फिर लौटा, शिखर तक पहुंचा, पर एक बदला हुआ इंसान बनकर। कभी-कभी सोचता हूं कि अगर मैं उस दिन छलांग नहीं लगाता, तो क्या होता? फिर खुद को जवाब देता हूं… शायद नियति ने मुझे उस दिन वहां भेजा था, उन्हें बचाने के लिए नहीं, बल्कि खुद को फिर से तलाशने के लिए। यूरोप का सबसे खतरनाक पर्वत मो ब्लां फ्रांस और इटली की सीमा पर स्थित आल्प्स की सबसे ऊंची चोटी है। ऊंचाई लगभग 4,808 मीटर (15,777 फीट) है। अत्यधिक ठंड और बर्फीले तूफान इसे लगभग असंभव बना देते हैं। बिना अनुभव और गाइड के बगैर जाना जोखिम भरा है। ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी, पत्थर गिरना और हिमस्खलन बड़ी समस्या है। इस पर्वत पर चढ़ाई में लगभग 100 मौतें हर साल दर्ज होती हैं। इसके चलते इसे यूरोप का सबसे खतरनाक पर्वत माना जाता है।
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