इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक किसान का 50 हजार रुपये का लोन बढ़कर 3,71,384 रुपये हो जाने को गंभीरता से लिया है। साथ ही इस मामले में संतोषजनक उत्तर नहीं मिलने पर उत्तर प्रदेश सहकारी ग्राम विकास बैंक के प्रबंध निदेशक को तलब किया है।
साथ ही अगली सुनवाई तक किसान की जमीन की नीलामी और वसूली की कार्यवाही पर रोक लगा दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने महोबा के बैजनाथ की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। कोर्ट ने कहा कि किसानों को साहूकारों के शोषण से बचाने के लिए बने बैंक ही अगर उन पर दमनकारी वित्तीय बोझ डालेंगे, तो यह बैंक की स्थापना के मूल उद्देश्यों के खिलाफ होगा। भैंस खरीदने को लिया था लोन मामले के तथ्यों के अनुसार महोबा निवासी याची ने वर्ष 2009 में दो भैंस खरीदने के लिए उत्तर प्रदेश सहकारी ग्राम विकास बैंक से 50 हजार रुपये का लोन लिया था। इसके लिए उसने अपनी 0.882 हेक्टेयर जमीन बैंक के पास बंधक रखी थी। याची द्वारा लोन न चुका पाने पर बैंक अधिकारियों की सुस्ती और लचर व्यवस्था के कारण लोन की रकम 2026 तक आते-आते करीब पौने चार लाख रुपये हो गई।
बैंक ने याची की जमीन को नीलाम करने के लिए नोटिस जारी कर दिया था, जिसके खिलाफ उसने यह याचिका दाखिल की। चक्रवृद्धि जैसा भारी-भरकम ब्याज बैंक के अधिकारियों की लापरवाही के कारण यह मामूली लोन इतना ज्यादा कैसे बढ़ गया? क्या बैंक ने नियमों (यूपी सहकारी ग्राम विकास बैंक नियमावली 1971) का पालन किया था? किस आधार पर 13 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से चक्रवृद्धि जैसा भारी-भरकम ब्याज वसूला जा रहा है? शाखा प्रबंधक कोर्ट के इन सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं दे सके। कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश सहकारी ग्राम विकास बैंक लिमिटेड के प्रबंध निदेशक को 21 अप्रैल को सभी जरूरी रिकॉर्ड के साथ व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि प्रबंध निदेशक खुद आकर बताएं कि बैंक की ब्याज दरें तय करने और वसूली का क्या तरीका है। कोर्ट की अहम टिप्पणी: यह अकल्पनीय है कि दो भैंसों की खरीद के लिए लिया गया 50 हजार का मामूली लोन बढ़कर 3,71,384 होने दिया जाए। बैंक की वेबसाइट कहती है कि वे किसानों की सेवा के लिए तत्पर हैं लेकिन यह कृत्य किसानों पर असहनीय बोझ डालने जैसा है।

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