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Vishwakhabram: Iran के Supreme Leader Ali Khamenei जनता का विद्रोह ज्यादा समय तक नहीं झेल पाएंगे

ईरान में गहराते आर्थिक संकट के खिलाफ भड़के जन आक्रोश ने एक बार फिर सड़कों पर उबाल ला दिया है। देश के कई शहरों में महंगाई, बेरोजगारी और मुद्रा के गिरते मूल्य के विरोध में लोग सड़कों पर उतरे हैं जिनके समर्थन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी आ गये हैं। हम आपको बता दें कि ईरान में हालात उस समय और तनावपूर्ण हो गए जब सुरक्षा बलों के साथ झड़पों में कुछ लोगों की मौत की खबरें सामने आईं। इसके बाद विरोध प्रदर्शनों ने और आक्रामक रूप ले लिया। बाजारों में दुकानें बंद रहीं, छात्र सड़कों पर उतरे और कामगार वर्ग ने खुलकर सरकार और सुप्रीम लीडर के खिलाफ नारे लगाए।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि लगातार बढ़ती महंगाई ने आम जीवन को असहनीय बना दिया है। खाद्य पदार्थों की कीमतें आसमान छू रही हैं, ईंधन महंगा हो चुका है और रोजगार के अवसर सिमटते जा रहे हैं। राष्ट्रीय मुद्रा की गिरावट ने लोगों की बचत को लगभग बेकार कर दिया है। सरकार के तमाम दावों के बावजूद हालात सुधरने के बजाय और बिगड़ते दिख रहे हैं। इसी हताशा ने विरोध को जन्म दिया है।

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हम आपको बता दें कि सुरक्षा बलों की सख्ती के बावजूद विरोध प्रदर्शन थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। कई इलाकों में आंसू गैस और लाठियों का इस्तेमाल किया गया है। सरकार ने इसे बाहरी साजिश बताने की कोशिश की है लेकिन सड़कों पर दिख रहा गुस्सा साफ बताता है कि समस्या जड़ से जुड़ी हुई है। यह विरोध सिर्फ आर्थिक मांगों तक सीमित नहीं रहा बल्कि कई जगहों पर सत्ता के खिलाफ सीधे नारे भी सुनाई दिए। यह संकेत है कि असंतोष अब गहराई तक पहुंच चुका है।
देखा जाये तो ईरान में भड़क रहे ये विरोध प्रदर्शन केवल रोटी कपड़ा और मकान की मांग नहीं हैं। यह उस व्यवस्था के खिलाफ जनाक्रोश है जो वर्षों से आम आदमी की पीठ पर आर्थिक बोझ लादती आ रही है। जब महंगाई काबू से बाहर हो जाए, जब मुद्रा का मूल्य रोज गिरे और जब युवा भविष्य को अंधेरे में देखे तब सड़कों पर उतरना स्वाभाविक हो जाता है। ईरान आज उसी मोड़ पर खड़ा है जहां सरकार और जनता के बीच भरोसे की दीवार लगभग ढह चुकी है।
देखा जाये तो इन प्रदर्शनों का मूल कारण आर्थिक कुप्रबंधन है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने अर्थव्यवस्था को जरूर चोट पहुंचाई है लेकिन सच्चाई यह भी है कि आंतरिक नीतियों की विफलता ने हालात को और बदतर बना दिया है। जनता सवाल कर रही है कि जब संसाधन मौजूद हैं तो आम आदमी की जेब खाली क्यों है। जब सत्ता वर्ग सुविधाओं में जी रहा है तो आम नागरिक को हर दिन संघर्ष क्यों करना पड़ रहा है।
इस असंतोष के सामरिक प्रभाव भी कम खतरनाक नहीं हैं। ईरान मध्य पूर्व की राजनीति का एक अहम केंद्र है। यहां की अस्थिरता का असर पूरे क्षेत्र पर पड़ सकता है। अगर आंतरिक हालात और बिगड़ते हैं तो इसका सीधा प्रभाव क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय समीकरणों पर पड़ेगा। तेल और गैस की आपूर्ति में किसी भी तरह का व्यवधान वैश्विक बाजारों को हिला सकता है। यही कारण है कि दुनिया की नजरें ईरान की सड़कों पर टिकी हुई हैं।
साथ ही, सत्ता का रवैया इस संकट को और गहरा कर रहा है। संवाद और सुधार के बजाय दमन का रास्ता अपनाया जा रहा है। इतिहास गवाह है कि लाठी और बंदूक से जनता की आवाज को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता। जब लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं होतीं तो भय भी अपना असर खो देता है। ईरान में आज वही स्थिति बनती दिख रही है।
संभावित परिणामों पर नजर डालें तो तस्वीर और भी चिंताजनक है। यदि सरकार ने समय रहते आर्थिक सुधारों और राजनीतिक संवाद की पहल नहीं की तो यह विरोध और उग्र हो सकता है। इससे देश के भीतर विभाजन बढ़ेगा और शासन की वैधता पर गंभीर सवाल खड़े होंगे। दूसरी ओर यदि सत्ता जरूरत से ज्यादा सख्ती दिखाती है तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बढ़ेगा और ईरान और अधिक अलग थलग पड़ सकता है।
देखा जाये तो यह संकट एक चेतावनी है। केवल ईरान के लिए नहीं बल्कि उन तमाम देशों के लिए जहां सत्ता जनता की आवाज को नजरअंदाज करती है। आर्थिक न्याय और सामाजिक संतुलन के बिना कोई भी शासन लंबे समय तक स्थिर नहीं रह सकता। आज ईरान की सड़कों पर जो गुस्सा दिख रहा है वह वर्षों की अनसुनी पीड़ा का परिणाम है।
बहरहाल, फैसला सत्ता के हाथ में है। या तो वह इस जनाक्रोश को दुश्मन समझ कर कुचलने की कोशिश करे या इसे एक संदेश मान कर सुधार की राह पकड़े। इतिहास में वही सरकारें टिक पाई हैं जिन्होंने समय रहते जनता की बात सुनी। अगर ईरान ने यह मौका गंवाया तो यह संकट केवल आर्थिक नहीं रहेगा बल्कि एक बड़ा राजनीतिक और सामरिक भूचाल बन सकता है। वैसे ईरान की सड़कों पर जो दृश्य दिख रहे हैं वह दर्शा रहे हैं कि जनता के विद्रोह का ज्यादा समय तक सामना नहीं कर पाएंगे सुप्रीम लीडर।


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