कौशांबी जिले में पारंपरिक फसल सिंघाड़े की खेती लगातार घट रही है। बढ़ती लागत, कम मुनाफे और सरकारी सहायता के अभाव के कारण किसान इस खेती से दूर हो रहे हैं। सिंघाड़ा स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है, खासकर सर्दियों में, ऐसे में इसकी खेती में आ रही गिरावट चिंता का विषय है। एक समय था जब कौशांबी में बड़े पैमाने पर सिंघाड़े की खेती की जाती थी। अब स्थिति यह है कि कई खेत खाली पड़े हैं और यह खेती केवल तालाबों तक सिमट कर रह गई है। किसान लगातार इस पारंपरिक फसल से मुंह मोड़ रहे हैं।बारा गांव की किसान विमला देवी, जो कई वर्षों से सिंघाड़े की खेती कर रही हैं, अपनी परेशानी बताती हैं। उनके अनुसार, “अब न तो लागत निकल पाती है और न ही बाजार में सही दाम मिलता है। लागत बहुत ज़्यादा है, और बचत नाम की कोई चीज़ नहीं है। सरकार की तरफ से भी कोई मदद नहीं मिलती, ऐसे में खेती कैसे करें?”इसी गांव के एक अन्य किसान राहुल भी समान समस्याओं का सामना कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “पानी और मज़दूरी की दिक्कत है, ऊपर से बाजार में फसल का उचित मूल्य नहीं मिलता। सरकार की ओर से कोई योजना भी नहीं है। मजबूरी में खेती करनी पड़ती है, वरना हम इसे छोड़ देते।”
किसानों का कहना है कि यदि सरकार तालाबों के सुधार, बीज सहायता और बेहतर विपणन व्यवस्था पर ध्यान दे तो सिंघाड़े की खेती को फिर से बड़े पैमाने पर शुरू किया जा सकता है।इस संबंध में क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी अक्षय लाल ने बताया कि सिंघाड़ा सेहत का खजाना है। यह सर्दियों में होने वाली कैल्शियम की कमी को दूर करने में बेहद प्रभावी है और हड्डियों को मजबूत बनाता है। उनके अनुसार, सिंघाड़े का सेवन करने वालों में कैल्शियम की कमी नहीं होती और यह गर्भवती महिलाओं के लिए भी बहुत लाभदायक है।
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